उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद खास माना जाता है। त्रेता युग में भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े कई स्थान यहां मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र को धार्मिक रंग में रंग देते हैं। धार्मिक महत्व के साथ-साथ आजादी के बाद से यह जिला राजनीतिक मंच पर भी अपनी अलग पहचान रखता है। यहां जन्मे या यहां से चुने गए जनप्रतिनिधियों ने देश और प्रदेश के अहम पदों की जिम्मेदारी संभाली है।
मुख्यमंत्री, स्पीकर और डिप्टी स्पीकर से लेकर प्रधानमंत्री तक की कुर्सी पर बैठे लोगों का नाता इस धरती से जुड़ा रहा है। आजादी से पहले भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे महान क्रांतिकारियों के आगमन ने सुल्तानपुर को विशेष गौरव दिलाया। धर्म से लेकर सियासत तक, इस जिले का अतीत बहुत ही संपन्न रहा है।
किसने बसाया सुल्तानपुर
मान्यता है कि इस जिले की नींव भगवान श्रीराम के ज्येष्ठ पुत्र कुश ने रखी थी। उन्होंने इसे भौगोलिक रूप से सुरक्षित स्थल पर मां गोमती के किनारे बसाया। 13वीं शताब्दी के अंत तक यह इलाका कुशपुर, कुशावती या कुशभवनपुर के नाम से पहचाना जाता था। वर्ष 1869 से पहले सुल्तानपुर में कुल 12 परगने हुआ करते थे।
अंग्रेजों के सत्ता संभालने के बाद सुल्तानपुर और आसपास के जनपदों की सीमाओं को नए सिरे से तय किया गया। इसी पुनर्गठन के तहत इसौली, बरौसा और अल्देमऊ परगने फैजाबाद से अलग होकर सुल्तानपुर में जोड़ दिए गए, जबकि इन्हौना, जायस, सिमरौता, मोहनलालगंज और सुबेहा यहां से हटाकर दूसरे सीमावर्ती जिलों में मिला दिए गए।
इस जिले ने दीं कई नामचीन हस्तियां
वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह के अनुसार, सुल्तानपुर के इतिहास पर नजर डालने से साफ होता है कि इस जिले ने ऐसी अनेक प्रतिभाएं दी हैं जिन्होंने अपनी योग्यता के बल पर न केवल सुल्तानपुर बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया। इनमें जनरल बख्त खां प्रमुख हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अतुलनीय योगदान दिया। उनके वंशज आज भी सुल्तानपुर के बजेठी गांव में रहते हैं।
इसी तरह बाबू गणपत सहाय ने अपनी मेधा के दम पर सुल्तानपुर को शिक्षा के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ाया। उनका संपर्क पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, पुरुषोत्तम दास टंडन, सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं से रहा।
अंग्रेजी शासनकाल में देश के वाइस एडमिरल रहे वंशराज सिंह, वर्ष 1971 में केंद्रीय मंत्री बने बाबू केदारनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पंडित श्रीपति मिश्र, कृषि वैज्ञानिक डॉ. मनोदत्त पाठक तथा जिला विभाजन से पहले संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और विभाजन के बाद मेनका गांधी का सुल्तानपुर से गहरा रिश्ता रहा है। गांधी परिवार के कई सदस्य यहां से सांसद चुने गए।
प्राचीन इतिहास की झलक
वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह ने बातचीत में बताया कि सुल्तानपुर प्राचीन काल से ही बेहद महत्वपूर्ण रहा है, क्योंकि यहां रामायण काल और बौद्ध काल से जुड़े अनेक प्रमाण मिलते हैं। प्राचीन इतिहास में इस जिले का विशेष स्थान रहा है। कादीपुर स्थित विजेथुआ महावीरन धाम, लंभुआ स्थित धोपाप धाम और शहर का सीताकुंड रामायण काल से जुड़े माने जाते हैं।
यह जिला प्राचीन कोशल राज्य का हिस्सा था। इस भूमि ने उन्नति और अवनति तथा उत्थान और पतन के कई दौर देखे, पर सुल्तानपुर हर बदलाव के साथ कदम मिलाकर आगे बढ़ता रहा। प्रसिद्ध विद्वान और लेखक बाबू राजेश्वर सिंह की पुस्तक “सुल्तानपुर इतिहास की झलक” के अनुसार, सुल्तानपुर का प्राचीन नाम कुशपुर, कुशावती या कुशभवनपुर था। इन नामों की प्राचीनता का जिक्र लाला सीताराम की पुस्तक “अयोध्या का इतिहास” में भी प्रमाण सहित मिलता है।
डॉ. प्रभात श्रीवास्तव के अनुसार, चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वृत्तांत में इस स्थल को कियाशोपोलो नाम से दर्ज किया है, जो चीनी भाषा में लिखित केसपुत्त या केसिपुत्त से मेल खाता है। डॉ. के.सी. श्रीवास्तव की पुस्तक “प्राचीन भारत का इतिहास तथा संस्कृति” में उल्लेख है कि बौद्ध काल के गणराज्यों में दशम् गणतंत्र, कालामों का केसिपुत्त, कोशल राज्य के अधीन इसी क्षेत्र में स्थित था। उनके मुताबिक सुल्तानपुर में कुड़वार से लेकर पलिया तक इस क्षेत्र का विस्तार था।
वैदिक साहित्य के अनुसार, कालामों का संबंध पांचाल के केशियों से था। यहां के आलार कलाम उरबेला के समीप रहते थे, जहां गृहत्याग के बाद बुद्ध ने अपना पहला उपदेश ग्रहण किया था। आज भी कुड़वार के पश्चिम में कुछ दूरी पर गोमती नदी के किनारे बेला गांव बसा है, जहां रघुवंशी क्षत्रियों समेत अन्य जातियों के लोग रहते हैं। जिस स्थान को कभी केशिपुत्र कहा जाता था, उसे अब गढ़ा के नाम से जाना जाता है, जो आज भग्नावशेष में बदल चुका है।
कैसी है भौगोलिक स्थिति
मौजूदा सुल्तानपुर जिले में गोमती नदी उत्तर-पश्चिम दिशा से प्रवेश कर पूरे भूभाग को दो हिस्सों में बांट देती है और पूर्व-दक्षिण दिशा की ओर बहते हुए जिले के बाहर निकल जाती है। यह जिला 25.59 डिग्री से 26.40 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 81.32 डिग्री से 82.41 डिग्री पूर्वी देशांतर के बीच स्थित है।
इसकी पूर्वी सीमा जौनपुर और आजमगढ़ से तथा पश्चिमी सीमा अमेठी और बाराबंकी से लगती है। उत्तर में फैजाबाद और अंबेडकर नगर हैं, जबकि दक्षिण में प्रतापगढ़ जिला स्थित है। सुल्तानपुर ऐतिहासिक घटनाओं तथा सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों का साक्षी रहा है। प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सुल्तानपुर मुख्यालय की दूरी 138 किलोमीटर है, जबकि अयोध्या से यह 61 किलोमीटर दूर है।
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