कंडोम का सफर: 3 हजार साल पुरानी कहानी, कभी जानवरों की आंतों से बनता था यह गर्भनिरोधक

जिस कंडोम ने यौन संबंधों की दुनिया को बदल दिया, उसका इतिहास 3000 साल से भी ज्यादा पुराना है। कभी भेड़-बकरी की आंतों और कछुए के खोल से बनने वाला यह उपकरण आज ग्राफीन तक पहुंच चुका है।

कंडोम एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही ज्यादातर लोगों के मन में एक खास तरह की जिज्ञासा जाग जाती है। उम्र या पहचान कोई भी हो, इसे लेकर उत्सुकता हर किसी में रहती है। आज जिस कंडोम ने पूरी दुनिया में यौन संबंधों की परिभाषा ही बदल दी है, उसकी कहानी 3000 साल से भी अधिक पुरानी है। मौजूदा दौर का कंडोम बेहद मुलायम, पतला, फ्लेवर्ड, डॉटेड और क्लाइमेक्स डिले जैसे रूपों में मिलता है, लेकिन उस दौर की कल्पना कीजिए जब इसे भेड़ या बकरी की आंतों के चमड़े से तैयार किया जाता था। यहां हम गंभीर शोध पर आधारित इसकी पूरी कहानी विस्तार से बता रहे हैं।

जब जानवरों की आंतों से बनता था कंडोम

पबमेड सेंट्रल जर्नल के अनुसार, तकनीक चाहे कितनी भी आगे बढ़ गई हो, कंडोम का मूल सिद्धांत हजारों साल से एक जैसा ही है—बस इसकी डिजाइन बदलती रही है। इसका मुख्य उद्देश्य यौन संचारित बीमारियों को रोकना और वीर्य को महिला के शरीर में जाने से रोकना है, ताकि गर्भधारण न हो।

इसका सबसे पहला प्रमाण होमर की रचना इलियट में मिलता है। इसमें एक लोककथा है कि क्रीट के राजा मिनोस के वीर्य से सांप और बिच्छू निकलते थे। कहा जाता है कि जब वे अपनी उप पत्नियों के साथ संबंध बनाते, तो वे पत्नियां मर जातीं। इन मौतों को रोकने के लिए सलाहकारों की मदद से एक तरकीब निकाली गई। इसके तहत बकरी की आंत या मूत्राशय निकालकर उससे एक संकरी थैली जैसा आवरण बनाया जाता था, जिसे लिंग पर पहना जाता था। इस आवरण को पहनकर जब राजा ने अपनी पत्नी से संबंध बनाए तो उस पत्नी ने 8 बच्चों को जन्म दिया।

हालांकि वीर्य से सांप-बिच्छू निकलने की बात अतिशयोक्ति लगती है, लेकिन इसी से जानवरों के ब्लैडर से कंडोम बनाने की कला सामने आई और धीरे-धीरे पूरे समाज में इसका चलन बढ़ता गया। आगे चलकर यह एक व्यवसाय बन गया। इन्हें कसाई तैयार करते थे, क्योंकि वे आंतों की मजबूत तन्यता से अच्छी तरह परिचित थे।

न्यू गिनी में बना पहला महिला कंडोम

1000 साल पुराने प्रमाण बताते हैं कि मिस्र की संस्कृति में पुरुष यौन संबंध के समय अक्सर एक शीथ का इस्तेमाल करते थे। इस शीथ को लिनन के कपड़े से बनाया जाता था और सामाजिक रुतबे को दर्शाने के लिए पुरुष रंगीन लिनन का प्रयोग करते थे। माना जाता है कि मिस्र में बिल्हार्जिया नामक ट्रॉपिकल बीमारी का बड़ा खतरा था, जिससे बचने के लिए लिंग के अगले हिस्से पर पहनी जाने वाली शीथ का आविष्कार किया गया।

वहीं, न्यू गिनी में रहने वाली प्राचीन जुकास जनजाति के लोगों ने संभवतः सबसे पहले महिला कंडोम बनाया। यह एक खास पौधे से तैयार होता था, जिसका एक सिरा खुला और दूसरा बंद रहता था। प्याले के आकार का यह कंडोम करीब 6 इंच लंबा होता था, जिसे महिला के प्राइवेट पार्ट में डाला जाता था। यह इस तरह फिट हो जाता था कि संबंध के दौरान पड़ने वाले दबाव को आसानी से झेल लेता था। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में एसिस्टेंट डायरेक्टर डोना ड्रकर का कहना है कि पुराने समय में पुरुष कंडोम के मुकाबले महिला कंडोम ज्यादा लोकप्रिय था।

चीन और जापान में कंडोम का स्वरूप

चीनी सभ्यता रेशम की विशेषज्ञता के लिए मशहूर थी, और इसी के अनुरूप प्राचीन चीन में रेशमी कागज से कंडोम बनाया जाता था, जिन पर तेल लगाकर चिकना किया जाता था। जैसे-जैसे बीमारियां और महामारियां मध्य यूरोप से पूर्व की ओर फैलीं, ये आवरण और भी प्रचलित होते गए।

जापानी सभ्यता में काबुता-गाटा (Kabuta-Gata) का इस्तेमाल होता था, जो लिंग के अग्रभाग (ग्लान्स) को ढकने वाला एक खोल था। इसे आमतौर पर कछुए के खोल से बनाया जाता था, पर कभी-कभी चमड़े से भी तैयार किया जाता था। काबुता-गाटा का उपयोग उन लोगों के लिए भी होता था जो स्तंभन दोष (erectile dysfunction) से जूझ रहे होते थे।

शोध से शुरू हुई आधुनिक कंडोम की राह

आधुनिक कंडोम के विकास में शुरुआती सबसे बड़ा योगदान यूरोपीय वैज्ञानिकों का रहा। मशहूर इतालवी शरीररचनाविद गैब्रिएले फैलोपियो—जिनके नाम पर फैलोपियन ट्यूब का नाम पड़ा—ने 1564 में इस दिशा में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने यौन संचारित बीमारी सिफलिस से बचाव के लिए लिनन से बने एक आवरण का वर्णन किया, जो केवल लिंग के अग्रभाग को ढकता था। इसे एक रिबन से बांधा जाता और लार से चिकना किया जाता था।

यह कंडोम एक बार इस्तेमाल के लिए नहीं था, बल्कि इसे साफ करके दोबारा प्रयोग में लाया जाता था। फैलोपियो ने इस पर 1100 पुरुषों पर अध्ययन किया, जिसमें शानदार सफलता मिली। उनकी रिसर्च ने आधुनिक कंडोम को सरल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। 17वीं शताब्दी के दौरान रिबन वाले कंडोम का इस्तेमाल गर्भनिरोधक के रूप में जमकर होने लगा।

आधुनिक कंडोम में भारत की अहम भूमिका

19वीं और 20वीं सदी में कंडोम को और सरल बनाया गया। इस दौर में आविष्कारकों ने वाटरप्रूफ कपड़े, गुट्टा पेरका (पेड़ से प्राप्त लैटेक्स) और इंडियन रबर से कंडोम बनाने की कोशिश की। भारतीय रबर का इसमें खास योगदान रहा, लेकिन एक समस्या थी। शुरुआती दौर में पेड़ से प्राप्त रबर के कंडोम मोटे होते थे और जल्दी टूट या झड़ जाते थे। गर्म होने पर ये नरम और लचीले हो जाते, जबकि ठंडे होने पर कठोर और भंगुर बन जाते थे।

इस समस्या को 1844 में वैज्ञानिक चार्ल्स गुडईयर (Charles Goodyear) ने हल किया। उन्होंने वल्कनीकृत रबर का पेटेंट कराया और पहला वल्कनीकृत रबर कंडोम 1855 में व्यापक रूप से बाजार में आ गया। इससे कंडोम की कीमत काफी घट गई और इसकी पूरी कहानी ही बदल गई।

विश्व युद्ध में कंडोम की बिक्री में उछाल

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कंडोम की बिक्री में तेज उछाल आया। सैनिकों को युद्ध पर भेजने से पहले कंडोम दिए जाते थे, क्योंकि अक्सर सैनिक दुश्मन देशों की महिलाओं के साथ यौन दुराचार की ओर प्रवृत्त रहते थे। शुरुआत में अमेरिका और ब्रिटिश सेना को नैतिकता का हवाला देते हुए कंडोम नहीं दिए जाते थे, लेकिन जब यौन संचारित बीमारियों से सैनिकों की मौतें होने लगीं, तो द्वितीय विश्व युद्ध से पहले उन्हें भी कंडोम दिया जाने लगा।

1920 में आया लेटेक्स रबर

प्रथम विश्व युद्ध के तुरंत बाद कंडोम का एक नया रूप सामने आया। सन 1920 में लेटेक्स रबर का विकास हुआ, जिसने कंडोम को वल्कनीकृत रबर के मुकाबले और भी पतला तथा अधिक टिकाऊ बना दिया। इन्हें बनाना भी आसान था, जिससे कीमत और कम हो गई। लेटेक्स कंडोम की शेल्फ लाइफ पांच साल थी, जो रबर कंडोम की तुलना में बड़ा सुधार था, क्योंकि उनकी गुणवत्ता केवल तीन महीने तक ही बनी रहती थी।

आज का आधुनिक कंडोम

आधुनिक कंडोम की तकनीक आज भी लेटेक्स पर ही आधारित है, लेकिन इसके रंग, रूप और डिजाइन में क्रांतिकारी बदलाव आ चुके हैं। आज के कंडोम में ग्राफीन का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे ये बेहद पतले, मजबूत और लचीले होते हैं और इनसे स्किन-ऑन-स्किन जैसा अनुभव मिलता है। इनकी सतह पर सुपर-हाइड्रोफिलिक नैनोपार्टिकल्स चिपके होते हैं, जो चिकनाई को बढ़ा देते हैं। कुछ नए कंडोम में एसटीडी रोधी दवाएं, सुन्न करने वाले एजेंट या इरेक्शन को सपोर्ट करने वाली दवा की कोटिंग भी की जाती है।

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