दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ (डूसू) का चुनाव केवल एक शैक्षणिक संस्थान के प्रतिनिधियों को चुनने का जरिया नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति की एक ऐसी नर्सरी है जिसने देश को कई बड़े नेता दिए हैं। कैंपस की दीवारों पर पोस्टर चिपकाने, सड़कों पर पर्चे बांटने और नुक्कड़ सभाओं में नारे लगाने वाले साधारण छात्र आगे चलकर देश के नीति-निर्धारक बने हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के इस राजनीतिक अखाड़े ने छात्र राजनीति को एक नया आयाम दिया है। यहाँ से निकले युवा नेताओं ने न केवल संसद तक का सफर तय किया, बल्कि देश के केंद्रीय मंत्रालयों और राज्यों की सरकारों में भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं।
छात्र राजनीति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला
दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस में होने वाले ये चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक रखते हैं। यहाँ का चुनावी माहौल देश के आम चुनावों से कम नहीं होता। राजनीति के जानकार मानते हैं कि डूसू के चुनाव युवाओं को जमीनी स्तर पर नेतृत्व क्षमता सिखाते हैं। इस चुनावी प्रयोगशाला में तैयार हुए छात्र नेताओं ने देश की राजनीति को एक नया मोड़ दिया है। पूर्व वित्त मंत्री से लेकर कई राज्यों के कद्दावर नेताओं तक, डूसू ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आइए जानते हैं ऐसे ही 5 दिग्गज चेहरों के बारे में जिन्होंने कैंपस से निकलकर देश की सत्ता के गलियारों तक का सफर तय किया।
1. अरुण जेटली: श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से वित्त मंत्रालय तक
दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति की जब भी चर्चा होती है, सबसे पहले दिवंगत नेता अरुण जेटली का नाम सामने आता है। उन्होंने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) से अपनी पढ़ाई की थी। साल 1974 में उन्होंने ABVP के उम्मीदवार के तौर पर डूसू अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था। इसके तुरंत बाद देश में आपातकाल लागू हो गया, जिसके दौरान छात्र आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। छात्र राजनीति के इस संघर्ष ने उन्हें एक बेहद परिपक्व नेता बना दिया। आगे चलकर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार के रूप में काम किया और देश के वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री और राज्यसभा में सदन के नेता जैसे बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों को सुशोभित किया।
2. अजय माकन: बेहद कम उम्र में रचा इतिहास
हंसराज कॉलेज के छात्र रहे अजय माकन ने डूसू के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा था। साल 1985 में केवल 21 साल की उम्र में उन्होंने NSUI के बैनर तले चुनाव लड़कर डूसू अध्यक्ष पद पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। इतनी कम उम्र में मिली इस सफलता ने उनके राजनीतिक करियर को एक नई दिशा दी। इसके बाद वे मुख्यधारा की राजनीति में तेजी से आगे बढ़े। वे दिल्ली विधानसभा के सदस्य बने और दिल्ली सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में काम किया। इसके अलावा, यूपीए सरकार के कार्यकाल में उन्होंने केंद्रीय खेल मंत्री और आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री जैसे बड़े मंत्रालयों की कमान संभाली।
3. विजय गोयल: वाजपेयी और मोदी सरकार में निभाई भूमिका
साल 1977-78 के दौरान ABVP की ओर से डूसू अध्यक्ष चुने गए विजय गोयल भी इसी छात्र राजनीति की उपज हैं। उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए कैंपस में अथक संघर्ष किया था। छात्रसंघ के दिनों में मिली इस सीख का फायदा उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर मिला। वे भारतीय जनता पार्टी के एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे। विजय गोयल ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल और बाद में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में भी केंद्रीय मंत्री के तौर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
4. अलका लांबा: कैंपस की सबसे तेजतर्रार महिला आवाज
साल 1995 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैंपस ने एक और शानदार नेतृत्व देखा, जब अलका लांबा ने NSUI की तरफ से भारी मतों से डूसू अध्यक्ष का चुनाव जीता। उनकी बेहतरीन और धारदार भाषण शैली ने उन्हें कैंपस के छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया था। छात्र राजनीति में अपनी धाक जमाने के बाद अलका लांबा ने मुख्यधारा की राजनीति का रुख किया। वे दिल्ली से विधायक चुनी गईं और अपनी मुखर आवाज के दम पर चर्चा में बनी रहीं। वर्तमान में वे ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं।
5. रेखा गुप्ता: छात्राओं की सुरक्षा और हॉस्टल के मुद्दों को दी आवाज
दौलता राम कॉलेज की छात्रा रहीं रेखा गुप्ता ने साल 1996-97 में ABVP के टिकट पर डूसू अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था। उनके कार्यकाल को कैंपस में छात्राओं की सुरक्षा और हॉस्टलों की बुनियादी समस्याओं को दूर करने के लिए किए गए प्रयासों के लिए याद किया जाता है। रेखा गुप्ता ने छात्र राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद वे मुख्यधारा की राजनीति में भी बेहद सक्रिय रहीं और स्थानीय निकाय से लेकर पार्टी के विभिन्न सांगठनिक पदों पर अपनी सेवाएं देकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन किया।
कई और नाम जिन्होंने छोड़ी अमिट छाप
डूसू की इस फेहरिस्त में केवल ये पांच नाम ही शामिल नहीं हैं, बल्कि कई अन्य नेताओं ने भी इस मंच का इस्तेमाल कर भारतीय राजनीति में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। इनमें निम्नलिखित नाम प्रमुख हैं:
- राजीव गोस्वामी: साल 1991 के ऐतिहासिक मंडल आयोग विरोधी आंदोलन के दौरान वे छात्र राजनीति का एक बड़ा और बेहद चर्चित चेहरा बनकर उभरे थे।
- नूपुर शर्मा और रागिनी नायक: इन दोनों महिला नेताओं ने भी डूसू के मंच से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और बाद में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पार्टियों की मुखर प्रवक्ता बनीं।
- गजराज बहादुर नागर: डूसू के पहले अध्यक्ष रहे गजराज बहादुर नागर ने छात्र राजनीति से अपनी शुरुआत की और बाद में हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण कार्य किए।
डूसू की चमक आज भी क्यों है बरकरार?
आज भी जब दिल्ली यूनिवर्सिटी में चुनाव होते हैं, तो पूरे देश की नजरें इस पर टिकी होती हैं। यह चुनाव केवल बैनर, पोस्टर और नारों का तमाशा नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों और नेतृत्व क्षमता को विकसित करने का एक जीवंत माध्यम है। कैंपस के चाय के ढाबों और टपरियों पर होने वाली गर्मागर्म बहसें भविष्य के नेताओं को तराशने का काम करती हैं। यहाँ का राजनीतिक माहौल छात्रों को देश की वास्तविक चुनौतियों से रूबरू कराता है। इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष गवाह है कि जो युवा आज कैंपस की गलियों में बदलाव की बात कर रहे हैं, वे कल देश की संसद में बैठकर देश के लिए नई नीतियां और कानून बना रहे होंगे। यही वजह है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी की इस 'गोल्डन नर्सरी' की साख और चमक आज भी पूरी तरह बरकरार है।
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