शी जिनपिंग के अमेरिकी दौरे से पहले डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दांव, 100% टैरिफ वाले नए कानून पर किए हस्ताक्षर

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान पर नकेल कसने वाले एक सख्त कानून को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है।

रूस और ईरान के खिलाफ ट्रंप का बड़ा कदम

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे से ठीक पहले, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़े कानून को अपनी मंजूरी दे दी है। शुक्रवार, 18 सितंबर को डोनाल्ड ट्रंप ने लिंड्से ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 नामक बिल पर हस्ताक्षर किए, जो आधिकारिक रूप से अब एक कानून बन गया है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य रूस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव को और अधिक बढ़ाना है, साथ ही ईरान के खिलाफ भी सख्त रुख अपनाना है।

यह नया कानून अमेरिका को उन देशों पर कड़ी आर्थिक कार्रवाई करने का अधिकार देता है, जो रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस का आयात करते हैं। इस कानून में प्रावधान है कि ऐसे देशों के आयातित सामानों पर 100% तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाया जा सकता है। इस कानून की जद में आने वाले देशों में चीन और भारत का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है, क्योंकि ये दोनों देश रूस के ऊर्जा संसाधनों के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं।

शी जिनपिंग की यात्रा और व्यापारिक दबाव

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आगामी 24 सितंबर को अमेरिका पहुंचने वाले हैं। डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच होने वाली यह उच्च-स्तरीय वार्ता कई मायनों में निर्णायक मानी जा रही है। उम्मीद की जा रही है कि इस बैठक के दौरान व्यापार, टैरिफ संबंधी विवादों, ताइवान का मुद्दा, ईरान युद्ध की स्थिति और अमेरिका-चीन के बीच चल रही व्यापारिक समझौतों पर व्यापक चर्चा होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि शी जिनपिंग के अमेरिका आगमन से ठीक पहले इस कानून पर हस्ताक्षर करना एक रणनीतिक कदम है। इसके जरिए डोनाल्ड ट्रंप चीन पर न केवल आर्थिक दबाव बनाना चाहते हैं, बल्कि वार्ता के दौरान अपना पलड़ा भारी रखना चाहते हैं। कानून के प्रावधान रूस पर प्रतिबंधों को और अधिक सख्त बनाते हैं, जिसका सीधा असर उन देशों पर पड़ना तय है जो रूस से व्यापारिक संबंध बनाए हुए हैं।

टैरिफ का अधिकार और प्रशासनिक प्रक्रिया

इस कानून को लेकर सबसे बड़ी भ्रांति यह हो सकती है कि क्या अब भारत या चीन जैसे देशों पर तुरंत 100% टैरिफ लागू हो गया है? इसका जवाब है नहीं। कानून के हस्ताक्षर होते ही टैरिफ खुद-ब-खुद प्रभावी नहीं होता है। यह कानून डोनाल्ड ट्रंप को एक शक्तिशाली अधिकार प्रदान करता है, जिसे वे अपनी इच्छा और प्रशासनिक आवश्यकता के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं।

  • कानून के सभी प्रावधान हस्ताक्षर के 30 दिन के भीतर प्रभावी हो जाएंगे।
  • किसी भी देश पर 100% टैरिफ लगाने का फैसला पूरी तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करेगा।
  • यह कानून एक प्रकार के 'हथियार' की तरह है, जिसे ट्रंप किसी भी समय ट्रिगर कर सकते हैं।

अतः वर्तमान में इसे भारत या चीन के खिलाफ एक तत्काल आर्थिक दंड के रूप में नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव बनाने की एक विधि के रूप में देखा जाना चाहिए।

चीन की नाराजगी और कूटनीतिक तनाव

इस कानून के पारित होने के बाद से ही चीन की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। चीन ने इसे एकतरफा प्रतिबंध और अमेरिका द्वारा अपनाई गई 'लॉन्ग-आर्म जूरिस्डिक्शन' की नीति बताया है, जिसे वह सिरे से नकारता है। हाल ही में ताइवान के मुद्दे को लेकर भी दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है। चीन ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि ताइवान उसकी 'रेड लाइन' है और यदि इसे पार किया गया, तो शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की प्रस्तावित बैठक भी रद्द हो सकती है।

अमेरिका का यह कदम रूस को अलग-थलग करने के साथ ही चीन को यह स्पष्ट संदेश देने की कोशिश भी है कि अमेरिका अपनी व्यापारिक नीतियों में किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है। आने वाले दिन, विशेष रूप से 24 सितंबर की वार्ता, यह तय करेगी कि क्या यह कानून केवल एक चेतावनी है या भविष्य में किसी बड़े आर्थिक टकराव की नींव साबित होगा।

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