डोनाल्ड ट्रंप के हाथ लगा 100 फीसदी टैरिफ का ब्रह्मास्त्र, क्या भारत और चीन पर मंडरा रहा है बड़ा आर्थिक संकट

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नए कानून पर हस्ताक्षर कर रूस और ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार हासिल कर लिया है, जिससे भारत और चीन के लिए नई चिंताएं पैदा हो गई हैं।

अमेरिका का नया कानून और ट्रंप का दांव

जिस बात की आशंका लंबे समय से जताई जा रही थी, वही हकीकत में बदल गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब एक ऐसा कदम उठाया है जिसने वैश्विक व्यापारिक गलियारों में खलबली मचा दी है। डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' नामक कानून पर अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस कानून के अस्तित्व में आने के साथ ही अमेरिकी प्रशासन के पास एक ऐसा ब्रह्मास्त्र आ गया है, जो सीधे तौर पर रूस से कच्चे तेल और गैस का आयात करने वाले देशों के लिए खतरे की घंटी है। इस कानून के तहत अमेरिका अब रूस और ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाले देशों पर 100 फीसदी तक का भारी-भरकम टैरिफ लगा सकता है।

कानून की बारीकियाँ और अधिकार

शुक्रवार को स्थानीय समय के अनुसार लगभग 3 बजे डोनाल्ड ट्रंप ने इस महत्वपूर्ण बिल को अपनी मंजूरी दी। इससे पहले, अमेरिकी संसद के निचले सदन 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव' में इस विधेयक को 262-159 के मतों से पारित किया गया था। अब ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद यह एक पूर्ण कानून बन चुका है। इस कानून के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह रूस से ऊर्जा संसाधनों (कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस) का आयात करने वाले देशों पर दंडात्मक शुल्क या टैरिफ लागू कर सकते हैं। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इस कानून के पास होते ही सभी देशों पर स्वतः ही 100 फीसदी टैरिफ लागू नहीं हो गया है, बल्कि ट्रंप को इसे लागू करने का कानूनी विकल्प मिल गया है।

भारत और चीन पर क्या असर होगा

इस कानून के दायरे में सबसे प्रमुख रूप से वे देश आते हैं जो रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा खरीद रहे हैं। इसमें भारत, चीन, हंगरी, स्लोवाकिया और अजरबैजान जैसे देशों का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। ये वे पाँच देश हैं जो रूस के कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं। कानून के प्रावधानों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति इन देशों पर 100 फीसदी तक का अतिरिक्त आयात शुल्क लगा सकते हैं यदि वे रूस पर लगे तेल प्रतिबंधों का उल्लंघन करने में मदद करते हैं या नियमों को ताक पर रखते हैं।

भारत का रुख और ऊर्जा सुरक्षा

भारत सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद संतुलित और दृढ़ प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि भारत अपनी 1.4 अरब की विशाल आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। भारत की विदेश नीति और आर्थिक प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा सबसे ऊपर है। मंत्रालय के अनुसार, भारत किसी भी बाहरी दबाव में झुकने वाला नहीं है। भारत का यह मानना है कि वह बाजार की बदलती हुई परिस्थितियों के आधार पर अपनी ऊर्जा के स्रोत खुद तय करेगा। साथ ही, भारत अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए हर संभव आवश्यक कदम उठाने के लिए तैयार है। यदि रूसी तेल व्यावसायिक रूप से भारत के लिए किफायती और फायदेमंद बना रहता है, तो उसे पूरी तरह छोड़ना भारत के लिए एक आसान विकल्प नहीं होगा।

छूट का प्रावधान और भविष्य की संभावनाएं

इस कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को यह छूट भी दी गई है कि वे कुछ खास परिस्थितियों में किसी देश को टैरिफ से राहत दे सकें। लेकिन इसके लिए उन्हें अमेरिकी कांग्रेस को यह प्रमाणित करना होगा कि वह विशिष्ट छूट अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत पर सीधे 100 फीसदी टैरिफ लगा देना अमेरिका के लिए भी आसान नहीं होगा। ऐसा करने से अमेरिकी बाजार में आयातकों की लागत में भारी बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका सीधा असर वहां के आम उपभोक्ताओं और कारोबार पर पड़ेगा। इसलिए, डोनाल्ड ट्रंप कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले इन संभावित प्रतिकूल प्रभावों पर गंभीरता से विचार करेंगे।

ट्रेड डील और व्यापारिक अनिश्चितता

फिलहाल भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापारिक समझौतों को लेकर चर्चाएं चल रही हैं। ऐसे में इस कानून का प्रभाव कितना होगा और यह कब लागू किया जाएगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। यदि भविष्य में वास्तव में 100 फीसदी टैरिफ लागू होता है, तो भारत से अमेरिका निर्यात किए जाने वाले उत्पादों की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे भारतीय निर्यातकों को चुनौतीपूर्ण स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल भारत की रणनीति सावधानी बरतने और अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने की है। आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन का रुख यह तय करेगा कि यह 'ब्रह्मास्त्र' वास्तव में उपयोग किया जाएगा या इसे केवल एक कूटनीतिक दबाव बनाने के साधन के रूप में रखा जाएगा।

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