सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस का सच
इन दिनों सोशल मीडिया पर रायपुर जिला उपभोक्ता आयोग का एक आदेश खूब वायरल हो रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दावा किया जा रहा है कि यदि आपकी कार E20 पेट्रोल के कारण खराब होती है, तो कंपनी आपको नई गाड़ी देने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य होगी। लेकिन इस दावे की सच्चाई कुछ और ही है। इस मामले में उपभोक्ता आयोग ने सिर्फ E20 ईंधन की वजह से कार बदलने का आदेश नहीं दिया है। वास्तव में, अदालत ने इस बात को आधार बनाया है कि मारुति सुजुकी ने ग्राहक से महत्वपूर्ण जानकारी छिपाकर पुराना मॉडल बेचा और बाद में भी कार में आ रही तकनीकी खामियों को सुधारने में नाकाम रही। यही कारण है कि कंपनी को अब पुरानी कार वापस लेकर नई कार देने का निर्देश दिया गया है।
क्या था पूरा मामला
यह पूरा विवाद रायपुर के रहने वाले डॉक्टर प्रेमराज देवता से जुड़ा है। उन्होंने 3 जून 2024 को मारुति सुजुकी की ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड कार खरीदी थी। इस मामले में सबसे अहम बात यह रही कि जो कार उन्हें बेची गई, उसका निर्माण जनवरी 2023 में हुआ था। यानी ग्राहक को जो गाड़ी डिलीवर की गई, वह डेढ़ साल पुरानी मैन्युफैक्चरिंग वाली थी।
पांच महीने बाद ही शुरू हो गई मुसीबत
कार खरीदने के महज पांच महीने के भीतर ही उसमें तकनीकी खराबी के संकेत मिलने लगे। कार चलते-चलते अचानक बंद हो जाती थी। परेशान होकर जब ग्राहक ने इसे अधिकृत सर्विस सेंटर में दिखाया, तो वहां बताया गया कि पेट्रोल में मिलावट की समस्या है। सर्विस सेंटर के कर्मचारियों ने फ्यूल टैंक की सफाई कर कार वापस तो दे दी, लेकिन कुछ समय बाद ही वही समस्या फिर से उभर आई। दोबारा टैंक साफ करने के बावजूद कार में बार-बार खराबी आती रही, जिससे ग्राहक काफी परेशान हुआ।
लैब रिपोर्ट ने खोला सच
डॉक्टर प्रेमराज देवता ने इस मामले में पेट्रोल का सैंपल लिया और उसे सरकारी मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा। रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि पेट्रोल में एथेनॉल की मौजूदगी है। इसी जांच रिपोर्ट को आधार बनाकर उपभोक्ता ने तर्क दिया कि उनकी कार E20 ईंधन के अनुकूल (Compatible) नहीं थी, फिर भी उन्हें यह कार दी गई।
कंपनी का रुख और तर्क
उपभोक्ता आयोग के सामने मारुति सुजुकी और उसके डीलर ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि कार में किसी भी प्रकार का मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट नहीं था। कंपनी का कहना था कि समस्या खराब गुणवत्ता वाले पेट्रोल के इस्तेमाल से पैदा हुई है और ऐसे मामले वारंटी की शर्तों के अंतर्गत नहीं आते हैं। कंपनी ने स्पष्ट रूप से कार को बदलने या वापस लेने से इनकार कर दिया था।
अदालत का फैसला क्यों रहा ऐतिहासिक
उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले में यह बिल्कुल नहीं कहा कि E20 पेट्रोल की वजह से हर कार खराब हो जाती है। कोर्ट ने अपना ध्यान इस बिंदु पर केंद्रित किया कि जनवरी 2023 में बनी कार, जो कि E20 कंपैटिबल नहीं थी, उसे जून 2024 में ग्राहक को यह जानकारी दिए बिना बेच दिया गया। इसके अलावा, कार में लगातार आ रही खराबी के बाद भी कंपनी ने कोई ठोस समाधान नहीं निकाला। न तो कंपनी ने कार वापस ली और न ही कोई E20 कंपैटिबल मॉडल देने की पेशकश की। आयोग ने इसे सीधे तौर पर 'सेवा में कमी' और 'अनुचित व्यापार व्यवहार' के दायरे में रखा है।
कोर्ट ने दिया हर्जाने का आदेश
रायपुर जिला उपभोक्ता आयोग ने मारुति सुजुकी और उसके डीलर को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे ग्राहक की पुरानी कार वापस ले लें और उसके बदले 45 दिनों के भीतर उसी मॉडल की नई E20 कंपैटिबल कार मुहैया कराएं। यदि कंपनी इस आदेश का पालन करने में विफल रहती है, तो उसे कुल ₹20.50 लाख का भुगतान करना होगा। इस भुगतान की राशि का विवरण इस प्रकार है:
- कार की मूल कीमत: ₹18.29 लाख
- RTO शुल्क: ₹1.86 लाख
- बीमा का खर्च: ₹34,644
- मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा: ₹1 लाख
- मुकदमे का खर्च: ₹10,000
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