बालाघाट की पहचान और रेंजर्स कॉलेज का महत्व
मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला पूरी दुनिया में अपनी जैव विविधता के लिए मिसाल के तौर पर जाना जाता है। इस जिले के कुल भूभाग का लगभग 53 प्रतिशत हिस्सा घने जंगलों से घिरा हुआ है। यहाँ के वनों में न केवल विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे मौजूद हैं, बल्कि जंगली जानवरों और दुर्लभ पक्षियों की भी एक बड़ी श्रृंखला पाई जाती है। यही कारण है कि प्रकृति के गहन अध्ययन के लिए बालाघाट को हमेशा से ही एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देखा गया है। इसी ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व को समझते हुए ब्रिटिश शासन के दौरान यहाँ रेंजर कॉलेज की शुरुआत की गई थी, जिसने आगे चलकर वैश्विक स्तर पर बालाघाट की एक अलग पहचान स्थापित की। हालांकि, पिछले 12 वर्षों से यहाँ फॉरेस्टर्स की ट्रेनिंग पूरी तरह से बंद थी, जिससे स्थानीय लोगों के मन में यह डर बैठ गया था कि कहीं यह कॉलेज जबलपुर स्थानांतरित न हो जाए। अब इस बारे में आधिकारिक पुष्टि हो गई है कि कॉलेज कहीं शिफ्ट नहीं होगा और जल्द ही यहां रौनक लौटेगी।
रेंजर्स कॉलेज का गौरवशाली इतिहास
रेंजर्स कॉलेज की स्थापना की कहानी काफी पुरानी है। वर्ष 1907 में ब्रिटिश सरकार ने भारत की विशाल वन संपदा का सही ढंग से प्रबंधन करने के उद्देश्य से बालाघाट में इस संस्थान को स्थापित किया था। उस समय पूरे ब्रिटिश भारत में वानिकी शिक्षा प्रदान करने और वन रक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए बालाघाट को सबसे उपयुक्त स्थान माना गया था। समय के साथ इसमें बदलाव आए और नवंबर 1979 में भारत सरकार ने इस संस्थान को 'वन रेंजर्स कॉलेज' का आधिकारिक नाम दिया। उस दौर में कॉलेज का पूरा प्रशासन सीधे केंद्र सरकार के अधीन संचालित होता था। इसके बाद 1 अप्रैल 1990 को इसकी जिम्मेदारी मध्य प्रदेश शासन के वन विभाग को सौंप दी गई। अपनी स्थापना के समय से लेकर वर्ष 2014 तक, यह कॉलेज देश भर के वन विभाग के लिए एक प्रमुख केंद्र रहा, जहां से चयनित परीक्षार्थी वन सेवा का प्रशिक्षण लेने आते थे।
साल 2014 के बाद क्यों आया संकट?
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह रही कि 2014 के बाद इस कॉलेज में प्रशिक्षण के लिए कोई भी नई बैच नहीं आई। गतिविधियों के पूरी तरह ठप हो जाने के कारण इस ऐतिहासिक धरोहर के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। लंबे समय तक संस्थान में सन्नाटा रहने के कारण यह चर्चा जोर पकड़ने लगी थी कि कॉलेज की ट्रेनिंग सुविधाओं को जबलपुर शिफ्ट कर दिया जाएगा। इस कयासबाजी ने स्थानीय लोगों को चिंतित कर दिया था क्योंकि यह कॉलेज जिले की विरासत से जुड़ा हुआ है। लेकिन अब इन तमाम शंकाओं और अटकलों पर पूरी तरह से विराम लग गया है। बालाघाट वन सर्किल के मुख्य संरक्षक गौरव चौधरी ने स्पष्ट रूप से पुष्टि कर दी है कि रेंजर्स कॉलेज बालाघाट में ही स्थित रहेगा और इसका विस्थापन नहीं होगा।
सियासी गलियारों में क्रेडिट वॉर
कॉलेज के वापस शुरू होने की खबर के साथ ही बालाघाट की राजनीति में इसे लेकर दावेदारी और क्रेडिट लेने की होड़ भी शुरू हो गई है। जब दो साल पहले कॉलेज के विस्थापन की खबरें मीडिया में आई थीं, तब कई स्थानीय संगठनों ने सड़क पर उतरकर इसका विरोध किया था। उस दौरान सांसद भारती पारधी पर भी निष्क्रियता के आरोप लगे थे, जिसके जवाब में उन्होंने भोपाल और दिल्ली के संबंधित विभागों में लगातार पत्राचार करने की बात कही है। अब जब बैच आने की कवायद शुरू हुई है, तो वे भी इस उपलब्धि का श्रेय लेने में पीछे नहीं हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस नेता अनूप सिंह बैंस का दावा है कि उन्होंने इस मुद्दे पर केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की थी और उनके आश्वासन के बाद ही कॉलेज का भविष्य सुरक्षित हुआ है। इस तरह के बयानों ने इलाके में क्रेडिट वॉर को एक नया मोड़ दे दिया है।
कब से शुरू होगी ट्रेनिंग?
रेंजर्स कॉलेज में नई बैच के दाखिले को लेकर चल रहे सवालों पर मुख्य संरक्षक गौरव चौधरी ने स्थिति साफ की है। उन्होंने बताया कि ट्रेनिंग शुरू करने के लिए सभी आवश्यक तैयारियां अंतिम चरण में चल रही हैं। इसके लिए वन विभाग से अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है और भारत सरकार के माध्यम से विभाग को पत्र भेजने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बैच वर्ष में दो बार आवंटित होती है, जिसमें पहली बैच अप्रैल और दूसरी बैच दिसंबर के महीने में आती है। हालांकि सांसद भारती पारधी ने जुलाई में बैच शुरू होने की बात कही थी, लेकिन विभागीय अधिकारियों के अनुसार प्रक्रिया के चलते जुलाई में बैच की शुरुआत संभव नहीं है, लेकिन भविष्य में यहां प्रशिक्षण का सिलसिला फिर से गति पकड़ेगा।
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