बलोच नागरिकों की आजीविका पर पाकिस्तानी सेना का प्रहार, ड्रोन हमले में 100 से ज्यादा मवेशी मारे गए

पाकिस्तान में बलोच समुदाय के खिलाफ सैन्य अत्याचारों का सिलसिला जारी है, जहां अब सेना न केवल लोगों को बल्कि उनकी आजीविका के साधन पशुधन को भी निशाना बना रही है।

बलूचिस्तान में सैन्य दमन का नया चेहरा

पाकिस्तान की सेना के सैन्य अभियानों का दायरा अब बलोच निवासियों की जान लेने से आगे निकलकर उनकी आर्थिक रीढ़ तोड़ने तक पहुंच गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, बलूचिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में पाकिस्तानी सेना द्वारा न केवल आम नागरिकों पर जुल्म ढाए जा रहे हैं, बल्कि उनकी आजीविका के प्रमुख संसाधनों जैसे कि मवेशियों और खेती को भी व्यवस्थित तरीके से नष्ट किया जा रहा है। स्थानीय आबादी को आर्थिक रूप से कमजोर करने की इस रणनीति ने पूरे क्षेत्र में दहशत और तबाही का माहौल बना दिया है।

मीर यार बलोच का गंभीर आरोप

बलोच नेता मीर यार बलोच ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि पिछले 78 वर्षों से बलूचिस्तान में दमन का जो दौर जारी है, उसने अब एक भयावह रूप ले लिया है। उनके दावों के अनुसार, वर्ष 1973 के सैन्य अभियान के दौरान कोहलू, काहान और चमालंग के मरी इलाकों में लगभग एक लाख मवेशियों को या तो लूट लिया गया था या फिर सैन्य बमबारी में उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सेना सुनियोजित तरीके से उन किसानों और चरवाहों को निशाना बना रही है जो पूरी तरह से पशुपालन और कृषि पर निर्भर हैं।

मस्तुंग में ड्रोन हमले का ताज़ा उदाहरण

हालिया घटनाक्रम में, 3 जून 2026 को मस्तुंग जिले के दश्त कंबील इलाके में पाकिस्तानी सेना की बर्बरता का एक और मामला सामने आया है। यहाँ सेना ने स्थानीय निवासी मुहम्मद इब्राहिम के घर को निशाना बनाकर एक ड्रोन हमला किया। हालांकि इस हमले में परिवार के किसी भी सदस्य को चोट नहीं आई, लेकिन इब्राहिम के परिवार के 100 से अधिक मवेशी इस हमले में मारे गए। मीर यार बलोच का कहना है कि ये मवेशी उस परिवार की कमाई का इकलौता जरिया थे, और इनके मारे जाने से पूरा परिवार गंभीर आर्थिक संकट और भुखमरी की कगार पर पहुंच गया है।

आजीविका छीनने की सोची समझी रणनीति

बलूचिस्तान के पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में रोजगार के अवसर ना के बराबर हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में परिवार पशुपालन पर जीवित रहते हैं। सैन्य अभियानों के दौरान न केवल घरों को आग के हवाले किया जा रहा है, बल्कि बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के लोगों को मारना और उन्हें जबरन लापता कर देना अब एक सामान्य घटना बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मवेशियों और फसलों को जानबूझकर निशाना बनाना लोगों की कमर तोड़ने और उन्हें मोहताज बनाने की एक सोची-समझी सैन्य रणनीति है।

वैश्विक संघर्षों से तुलना

मीर यार बलोच ने अपने आरोपों को पुष्ट करने के लिए दुनिया भर में हुए अन्य संघर्षों का हवाला दिया है। उन्होंने कहा कि सूडान के दारफुर, म्यांमार, दक्षिण सूडान और बोस्निया एवं हर्जेगोविना में भी इसी तरह के तरीके अपनाए गए थे, जहां गांवों, फसलों और पशुधन को सैन्य अभियानों के तहत नष्ट किया गया। उनके अनुसार, बलूचिस्तान में हो रही ये गतिविधियां भी उसी तरह के दमनकारी पैटर्न का हिस्सा हैं, जहां नागरिकों की आजीविका को युद्ध का हथियार बना दिया गया है।

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