84 साल पहले 'करो या मरो' के उस नारे ने कैसे हिला दी थी ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें

8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने मुंबई में भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल फूंका था, जिसने ब्रिटिश सत्ता की चूलें हिला दी थीं।

ऐतिहासिक आह्वान और क्रांति की शुरुआत

8 अगस्त 1942 की तारीख भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेड़ने के लिए करो या मरो का ऐतिहासिक नारा दिया था। इस एक नारे ने पूरे देश में आजादी की अलख जगा दी और ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन आक्रोश को चरम पर पहुंचा दिया।

शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी और जनता का साहस

गांधीजी के इस भाषण के ठीक अगले ही दिन ब्रिटिश हुकूमत ने कठोर रुख अपनाया। सरकार ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और मौलाना अबुल कलाम आजाद समेत कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को आनन-फानन में गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेज प्रशासन को पूरी उम्मीद थी कि शीर्ष नेतृत्व के जेल जाने के बाद आंदोलन बिखर जाएगा और इसकी ताकत खत्म हो जाएगी।

युवाओं ने संभाली आंदोलन की कमान

हालांकि, अंग्रेजों का यह आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ। जैसे ही मुख्य नेता जेल पहुंचे, भारत की सड़कों पर युवाओं, छात्रों और महिलाओं का हुजूम उमड़ पड़ा। नेतृत्वविहीन होने के बावजूद यह आंदोलन कमजोर पड़ने के बजाय और अधिक उग्र हो गया। इस दौरान समाज के हर वर्ग ने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला।

  • अरुणा आसफ अली ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए तिरंगा फहराया, जिसने लोगों में जोश भर दिया।
  • उषा मेहता ने बेहद गोपनीय तरीके से कांग्रेस रेडियो का संचालन किया, जिसके माध्यम से क्रांति का संदेश घर-घर तक पहुँचाया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन ने यह सिद्ध कर दिया कि अब भारतवासी आजादी से कम कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इसी जन-आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया था, जिसके बाद भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त हुआ।

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