सतना के जंगल में छिपाया गया अपराध
मध्य प्रदेश के सतना जिले के मझगवां वन परिक्षेत्र से एक बेहद गंभीर और विचलित करने वाली घटना सामने आई है, जिसने वन विभाग की सुरक्षा प्रणाली और उसकी जवाबदेही पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। सरभंगा जंगल में हुई एक बाघ की मौत के मामले में अब जाकर यह खुलासा हुआ है कि करीब दो महीने पहले शिकारियों द्वारा बिछाए गए बिजली के करंट की चपेट में आने से बाघ की जान चली गई थी। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस अपराध को छिपाने के लिए बाघ के शव को मौके पर ही गड्ढा खोदकर दफना दिया गया था, ताकि किसी को इसकी जानकारी न मिल सके। लंबे समय तक दबे रहे इस मामले का सच वन विभाग के ही एक कर्मचारी द्वारा उजागर किया गया।
मुखबिर की गुप्त सूचना के बाद शुरू हुई पड़ताल
इस पूरे मामले का पता तब चला जब वन विभाग को करीब पांच दिन पहले एक मुखबिर से गुप्त सूचना मिली कि सरभंगा के घने जंगलों में एक बाघ की संदेहास्पद स्थितियों में मौत हुई है और उसके साक्ष्यों को नष्ट कर दिया गया है। विभाग ने इस जानकारी को बेहद गंभीरता से लिया और तुरंत गुप्त जांच शुरू कर दी। अधिकारियों ने जंगल के उन इलाकों की पहचान की जहां वन्यजीवों की आवाजाही अधिक रहती है और संभावित स्थानों पर अपनी निगरानी बढ़ा दी।
वन चौकीदार की गिरफ्तारी से खुला राज
गुरुवार को वन विभाग ने अपनी कार्रवाई को तेज करते हुए डॉग स्क्वॉड और उड़नदस्ते की मदद से सरभंगा के जंगलों में बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान शुरू किया। खराब मौसम, लगातार हो रही बारिश और दुर्गम पहाड़ी रास्तों के कारण टीम को शुरू में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालांकि, गुरुवार देर रात तक अधिकारियों को कुछ ठोस सुराग मिले, जिसके आधार पर शुक्रवार की सुबह सरभंगा क्षेत्र में तैनात वन चौकीदार मिन्नता सिंह गोंड को हिरासत में ले लिया गया। पूछताछ के दौरान उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया और बताया कि करीब दो महीने पहले जंगली सुअर का शिकार करने के इरादे से जंगल में बिजली का नंगा तार बिछाया गया था, जिसकी चपेट में दुर्भाग्यवश एक बाघ आ गया और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
कंकाल की बरामदगी और वैज्ञानिक परीक्षण
आरोपी चौकीदार की निशानदेही पर वन विभाग की टीम ने बीट करारिया के कम्पार्टमेंट नंबर पीएफ-820 में खुदाई का काम शुरू किया। खुदाई के दौरान वहां से बाघ के अवशेष और कंकाल बरामद हुए। लगभग दो महीने से अधिक का समय बीत जाने के कारण शव पूरी तरह से विघटित हो चुका था। इन अवशेषों को बरामद करने के बाद सरभंगा वन विश्राम गृह लाया गया, जहां वन्यप्राणी चिकित्सक डॉ. नितिन गुप्ता और मुकुंदपुर जू की विशेषज्ञ टीम ने इनका विस्तृत परीक्षण किया। वैज्ञानिकों ने आगे की जांच के लिए कंकाल के नमूने और डीएनए सुरक्षित रख लिए हैं ताकि मामले की वैज्ञानिक पुष्टि हो सके।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत होगी कार्रवाई
बाघ के अवशेषों का अंतिम संस्कार वरिष्ठ वन अधिकारियों की उपस्थिति में किया गया। जांच के दौरान यह भी पता चला है कि इस साजिश में वन चौकीदार के अलावा दो अन्य संदिग्ध लोग भी शामिल थे। वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि वे अभी अन्य फरार आरोपियों की तलाश में जुटे हैं। इस पूरे मामले में दोषियों पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। विभाग का दावा है कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।
सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
इस घटना ने न केवल शिकारियों की सक्रियता को उजागर किया है, बल्कि वन विभाग के भीतर बैठे लोगों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जिस बाघ की सुरक्षा के लिए विभाग को तैनात किया गया था, उसी के कर्मचारी के परिवार की संलिप्तता से इतनी बड़ी घटना को अंजाम कैसे दिया गया? इसके अलावा, एक बाघ जैसे महत्वपूर्ण वन्यजीव की मृत्यु की जानकारी विभाग को पूरे दो महीने तक नहीं लगी, यह तंत्र की विफलता को दर्शाता है। विभाग अब इस बात की तहकीकात कर रहा है कि क्या यह शिकार केवल एक सुअर के लिए था या यह एक बड़े संगठित रैकेट का हिस्सा है। अधिकारी अब शिकारियों की पूरी साजिश, घटना को छिपाने के लिए अपनाए गए हथकंडों और इसमें शामिल हर एक व्यक्ति की भूमिका की विस्तृत जांच कर रहे हैं।
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