PoK में 'रियासत खाली करो' का ऐलान, शहबाज और मुनीर की सत्ता के खिलाफ फूटा जन आक्रोश

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आंदोलन का 24वां दिन एक नए और आक्रामक मोड़ पर पहुंच गया है, जहां प्रदर्शनकारियों ने अब पाकिस्तान से पूरी तरह बाहर जाने की मांग रख दी है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में विद्रोह की आग

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में चल रहे जन आंदोलन ने अब एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मोड़ ले लिया है। इस आंदोलन के 24वें दिन रावलाकोट के ईदगाह मैदान में उमड़ी हजारों की भीड़ ने इस्लामाबाद में बैठी शहबाज शरीफ सरकार और रावलपिंडी के फौजी आकाओं की नींव हिला दी है। जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के प्रमुख नेता सरदार अमन खान ने मंच से पाकिस्तान सरकार और उसकी सेना के खिलाफ अब तक का सबसे तीखा रुख अपना लिया है।

आतंकवाद और सेना का नापाक गठजोड़

रावलाकोट की जनसभा को संबोधित करते हुए सरदार अमन खान ने पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी ISI पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि आज जो लोग दुनिया के सामने कश्मीरियों को दहशतगर्द करार देने की कोशिश कर रहे हैं, वही पाकिस्तानी फौज है जिसने सबसे पहले कश्मीरियों के हाथों में हथियार थमाए थे। अमन खान ने दावा किया कि पाकिस्तान का यह नैरेटिव पूरी तरह झूठ है कि वह आतंकवाद के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को सेना ने खुद पाला और हथियारों से लैस किया, आज जब वे अपने बुनियादी हक की रोटी मांग रहे हैं, तो उन्हें आतंकवादी कहा जा रहा है।

जैश-ए-मोहम्मद की रैली का काला अध्याय

सरदार अमन खान ने पाकिस्तान प्रशासन और आतंकी संगठनों के बीच गहरे संबंधों को बेनकाब करने के लिए पिछले साल की एक घटना का उदाहरण दिया। उन्होंने जनता को याद दिलाते हुए कहा कि 5 फरवरी 2025 को इसी रावलाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने एक विशाल कार्यक्रम आयोजित किया था। उस समय स्थानीय प्रशासन ने न केवल उन्हें रैली निकालने की अनुमति दी, बल्कि उन्हें पूरी सुरक्षा भी प्रदान की थी। उस रैली के दौरान खुलेआम AK-47 और तलवारें लेकर आतंकी सड़कों पर मार्च कर रहे थे। अमन खान ने तंज कसते हुए कहा कि जब प्रशासन आतंकियों के मार्च को सुरक्षा देता है, तब उन्हें कोई बुराई नजर नहीं आती, लेकिन जब आम जनता अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्वक प्रदर्शन करती है, तो उनके खिलाफ फतवे जारी किए जाते हैं।

मुजफ्फराबाद कूच की आखिरी चेतावनी

प्रदर्शनकारियों ने हुकूमत को दो टूक लहजे में चेतावनी दी है कि अब संयम की सीमा समाप्त हो चुकी है। अवामी एक्शन कमेटी का कहना है कि अगर सरकार ने उनकी 38 मांगों को बातचीत के जरिए तुरंत पूरा नहीं किया, तो यह जनसैलाब सीधे मुजफ्फराबाद की ओर रुख करेगा। यह कोई सामान्य विरोध मार्च नहीं होगा, बल्कि यह एक निर्णायक आंदोलन होगा जो सरकार की जड़ों को हिला देगा। घाटी के कोने-कोने से लोग इस आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार हो चुके हैं और शहबाज सरकार इस बिगड़ते हालातों को संभालने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।

'रियासत खाली करो' का नया संकल्प

इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण और आक्रामक पहलू सरदार अमन खान का 'रियासत खाली करो' का नारा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर मुजफ्फराबाद की ओर मार्च शुरू होता है, तो अब मांग सिर्फ बिजली बिलों में राहत या आटे की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगी। उन्होंने कहा कि अब सिर्फ एक ही मांग होगी कि पाकिस्तान अपनी पूरी फौज और अपने साजो-सामान के साथ इस रियासत को खाली कर दे और यहां से वापस चला जाए। जैसे ही सरदार अमन खान ने माइक पर 'रियासत खाली करो' का नारा बुलंद किया, ईदगाह मैदान में मौजूद हजारों लोगों ने एक स्वर में इसका समर्थन किया। यह स्पष्ट संकेत है कि PoK की जनता अब पाकिस्तान के शोषण से पूरी तरह तंग आ चुकी है और वह आजादी के अलावा किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं है।

हुकूमत की उल्टी गिनती

यह आंदोलन अब सिर्फ एक स्थानीय विरोध प्रदर्शन नहीं रह गया है, बल्कि यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ी राजनीतिक और सुरक्षा चुनौती बन चुका है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ आसिम मुनीर के लिए स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। जनता के इस बढ़ते गुस्से ने इस्लामाबाद की धड़कनें बढ़ा दी हैं। यदि सरकार इस मुद्दे को सुलझाने में विफल रहती है, तो यह आंदोलन न केवल PoK की सत्ता को हिला सकता है, बल्कि पाकिस्तान के लिए एक नई और जटिल आंतरिक समस्या का कारण भी बन सकता है।

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