मध्य प्रदेश एक नई आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहल का गवाह बनने जा रहा है। आगामी 17 से 30 जून 2026 तक सिंधु नदी के पावन तट पर प्रथम सिंधु कुंभ का आयोजन किया जाएगा। इस ऐतिहासिक अवसर पर देश के कोने-कोने से संत, श्रद्धालु और संस्कृति प्रेमी एकत्र होंगे, जबकि उज्जैन इस महाआयोजन के नेतृत्व और समन्वय का प्रमुख केंद्र बनेगा।
तीन दशक पूरे होने पर विशेष स्वरूप
धार्मिक नगरी उज्जैन में सिंहस्थ यानी महाकुंभ का आयोजन वर्ष 2028 में होने वाला है, जिसमें करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु और साधु-संत पहुंचेंगे। इससे पहले सिंधु दर्शन यात्रा के 30 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 17 से 30 जून 2026 तक लेह-लद्दाख में प्रथम सिंधु कुंभ का भव्य आयोजन किया जा रहा है। सिंधु नदी के पवित्र किनारे पर होने वाला यह कार्यक्रम भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक परंपराओं और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनेगा।
इस आयोजन में भारत सहित करीब 20 देशों के श्रद्धालुओं, संतों और प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। मध्य प्रदेश, विशेष रूप से उज्जैन, इसमें अहम भूमिका निभाएगा और नेतृत्व केंद्र के रूप में कार्य करेगा। राष्ट्रीय मंत्री पुनीत सांखला के अनुसार, सिंधु कुंभ महज एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और अखंडता का विराट उत्सव होगा।
1997 में हुई थी शुरुआत
सिंधु संस्कृति और राष्ट्रीय एकता को समर्पित सिंधु दर्शन महोत्सव की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई थी। इस पहल को देशव्यापी पहचान दिलाने में वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और बाद में राष्ट्रीय चिंतक इंद्रेश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बीते तीन दशकों से यह आयोजन लेह-लद्दाख में पवित्र सिंधु नदी के तट पर लगातार होता आ रहा है। वर्ष 2026 में इसके 30वें आयोजन को विशेष रूप देते हुए इसे “प्रथम सिंधु कुंभ” नाम दिया गया है।
पुनीत सांखला के अनुसार, देश के पारंपरिक चार कुंभ जहां धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हुए हैं, वहीं सिंधु तट पर होने वाला यह भव्य आयोजन मानव प्रयासों से विकसित एक अनूठे कुंभ के रूप में नई पहचान कायम करेगा।
सिंधु नदी—संस्कृति की अमूल्य धरोहर
सिंधु नदी भारतीय संस्कृति, इतिहास और सभ्यता की अनमोल धरोहर मानी जाती है। यह सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि देश की प्राचीन पहचान और गौरव का प्रतीक है। इसके तट पर आयोजित होने वाला महाकुंभ लोगों को उनकी सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनेगा। इस आयोजन के जरिए सनातन मूल्यों, धार्मिक आस्थाओं और भारतीय संस्कृति की विविधता को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।
साथ ही यह कार्यक्रम सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और विभिन्न परंपराओं के बीच समन्वय का संदेश देगा। इसके माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और लद्दाख की प्राकृतिक सुंदरता, सांस्कृतिक समृद्धि तथा ऐतिहासिक विरासत को भी व्यापक पहचान मिलेगी।
उज्जैन रहेगा मुख्य केंद्र
इस बार सिंधु महोत्सव में उज्जैन को मध्य प्रदेश के प्रमुख प्रतिनिधि केंद्र के रूप में विकसित करने की तैयारी चल रही है। मालवा अंचल समेत प्रदेश के करीब 15 जिलों में सिंधु दर्शन समितियों का गठन हो चुका है, जिनके जरिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
आयोजन को भव्यता देने के लिए उज्जैन सहित विभिन्न जिलों की धार्मिक परंपराओं, लोक संस्कृति और विरासत को दर्शाने वाली आकर्षक झांकियां प्रस्तुत करने की योजना है। इससे मध्य प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को न केवल राष्ट्रीय, बल्कि वैश्विक मंच पर भी नया स्थान मिलेगा।
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