उत्तराखंड की सीमा पर शांति की वापसी
पिछले चार से पांच दिनों से उत्तराखंड की सीमाई इलाकों में जो डर, तनाव और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ था, वह अब छंट गया है। राज्य की सीमाओं पर डेरा डाले बैठे निहंग सिखों ने प्रशासनिक अधिकारियों के साथ हुई गहन बातचीत के बाद अपना धरना वापस लेने का निर्णय लिया है। राज्य प्रशासन के लिए यह एक बड़ी राहत की खबर है, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से कर्णप्रयाग तक निहंगों के कूच करने के अल्टीमेटम ने पूरे क्षेत्र में कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी थीं। हालांकि, अब स्थिति सामान्य होती दिख रही है और प्रशासनिक हस्तक्षेप से एक बड़े टकराव को टाल दिया गया है।
कुल्हाल बॉर्डर पर स्थिति और सुरक्षा इंतजाम
कुल्हाल बॉर्डर पर बीते कई घंटों से स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई थी। एहतियात के तौर पर पुलिस ने इस पूरे मार्ग को बैरिकेड्स लगाकर सील कर दिया था, जिसके चलते कुल्हाल पांवटा साहिब पुल पर वाहनों की लंबी कतारें लग गई थीं। स्थानीय प्रशासन ने पांवटा साहिब बाजार वाले मार्ग से उत्तराखंड में प्रवेश करने वाले सभी वाहनों की आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। यात्रियों को असुविधा से बचाने के लिए फोरलेन हाइवे को खुला रखा गया था। पांवटा साहिब गुरुद्वारा परिसर में निहंग सिखों की भारी मौजूदगी देखी गई थी, और देर रात तक मोहाली व चंडीगढ़ से भी निहंगों के कई वाहन वहां पहुंच चुके थे, जिससे माहौल और अधिक तल्ख हो गया था।
अल्टीमेटम और पुलिस की घेराबंदी
इस पूरे मामले की जड़ में वह अल्टीमेटम था जो निहंग सिखों द्वारा दिया गया था, जिसमें उन्होंने 25 जून को कर्णप्रयाग पहुंचने की घोषणा की थी। इस ऐलान के बाद उत्तराखंड का गृह विभाग पूरी तरह सतर्क हो गया था। राज्य के सभी सीमावर्ती प्रवेश बिंदुओं पर भारी पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया गया था। कुल्हाल सीमा पर पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे और वहां से गुजरने वाले प्रत्येक वाहन की गहन तलाशी ली जा रही थी। दोपहर 3 बजे तक निहंगों के जत्थे के सीमा तक पहुंचने की आशंका ने पुलिस प्रशासन की नींद उड़ा दी थी।
देर रात का बवाल और पुलिस से टकराव
विवाद तब और गहरा गया जब पांवटा साहिब गुरुद्वारा में घंटों चली लंबी वार्ता के बावजूद निहंग सिख पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। इसके विपरीत, उन्होंने उत्तराखंड की सीमा की ओर अपना कूच जारी रखा। कुल्हाल बॉर्डर पर तैनात पुलिस ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। निहंगों का आक्रोश इतना उग्र हो गया था कि उन्होंने सुरक्षा के लिए हाईवे पर लगाए गए मजबूत पुलिस बैरिकेड्स को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया और जबरन उत्तराखंड की सीमा में दाखिल हो गए। इस दौरान वाहनों में तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आईं, जिससे इलाके में भारी अफरा-तफरी मच गई। पुलिस बल मूकदर्शक बने रहने के बजाय स्थिति को संभालने की कोशिश करता रहा।
प्रेमनगर में सुरक्षा का कड़ा पहरा
निहंगों के उत्तराखंड सीमा में प्रवेश कर जाने के बाद, प्रेमनगर क्षेत्र को सुरक्षा के लिहाज से अति-संवेदनशील घोषित कर दिया गया। पुलिस ने पूरे इलाके को एक छावनी में तब्दील कर दिया और चप्पे-चप्पे पर सशस्त्र पुलिस जवानों की तैनाती सुनिश्चित की गई। देहरादून के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) स्वयं भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे ताकि बातचीत के जरिए किसी भी हिंसक टकराव को रोका जा सके। अधिकारियों ने निहंगों के जत्थे से सीधे संवाद किया और उन्हें कानून-व्यवस्था के दायरे में रहने के लिए राजी करने का प्रयास किया।
एसएसपी ने दी जानकारी: अब सब ठीक है
देहरादून के एसएसपी प्रमेंद्र डोभाल ने घटनाक्रम की जानकारी देते हुए बताया कि पुलिस की निरंतर सक्रियता और संवाद के सार्थक परिणाम निकले हैं। उन्होंने कहा कि 26 जून की सुबह से ही कुल्हाल बॉर्डर पर पुलिस बल पूरी मुस्तैदी के साथ तैनात था। एसएसपी के अनुसार, संगत के अधिकांश सदस्यों ने पुलिस प्रशासन के अनुरोध को स्वीकार किया और वापस पांवटा साहिब लौटने की सहमति जताई। उन्होंने बताया कि कुछ लोग और कुछ वाहन सीमा में आगे निकल गए थे, लेकिन पुलिस टीम ने मौके पर जाकर उनसे विस्तार से बातचीत की, जिसके बाद वे वापस लौटने के लिए सहमत हो गए। उन्होंने शांतिपूर्ण समाधान में सहयोग देने वाले सभी लोगों का आभार व्यक्त किया और भविष्य में इसी प्रकार के आपसी भाईचारे के माहौल की उम्मीद जताई।
क्या था विवाद का मुख्य कारण?
यह पूरा घटनाक्रम 16 जून से शुरू हुआ था, जब चमोली जिले के कर्णप्रयाग में निहंग श्रद्धालुओं और एक स्थानीय युवक के बीच विवाद हो गया था। यह मामला इतना बढ़ गया कि 20 जून को रुद्रप्रयाग जनपद के नगरासू में निहंग श्रद्धालुओं ने गुरुद्वारे के सेवादारों को बंधक बना लिया। इस तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए कर्णप्रयाग में धारा 163 लागू कर दी गई थी। गुरुद्वारे पर निहंगों का कब्जा लगातार 3 दिनों तक बना रहा। अंततः 23 जून, मंगलवार की शाम को, पंजाब से आए एक प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत के बाद निहंग सिखों ने गुरुद्वारा परिसर को खाली किया और वहां से वापस चले गए। इसके बाद ही 25 जून को पुनः कर्णप्रयाग पहुंचने का आह्वान किया गया था, जिसने इस पूरे प्रकरण को फिर से हवा दे दी थी। अब प्रशासन द्वारा स्थिति को नियंत्रित कर लेने के बाद राज्य के लोगों ने राहत की सांस ली है।
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