राजस्थान के इस गांव में मिट्टी से बनते हैं चमत्कारिक घोड़े, मन्नत पूरी होने पर उमड़ती है भीड़

जालौर जिले के हरजी गांव में पिछले 60 वर्षों से मामाजी के मिट्टी के घोड़े बनाने की अद्भुत परंपरा निभाई जा रही है। श्रद्धालु अपनी मुरादें पूरी होने पर आस्था के प्रतीक के रूप में इन घोड़ों को मंदिरों में अर्पित करते हैं।

आस्था और हुनर का अनोखा संगम

राजस्थान के जालौर जिले की आहोर तहसील में स्थित हरजी गांव इन दिनों अपनी एक खास लोक कला के लिए चर्चा में है। यहाँ पिछले करीब 60 साल से कुम्हार समुदाय के सात परिवार मिट्टी के घोड़े तैयार कर रहे हैं। ये केवल साधारण मिट्टी की मूर्तियां नहीं हैं, बल्कि इन्हें लोक देवता मामाजी के प्रति गहरी श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक माना जाता है।

कैसे तैयार होते हैं ये खास घोड़े

शिल्पकार पुखराज प्रजापत के अनुसार, इन घोड़ों को बनाने की प्रक्रिया बेहद मेहनत और धैर्य का काम है। इसमें किसी भी आधुनिक मशीन का इस्तेमाल नहीं होता। निर्माण प्रक्रिया के मुख्य चरण इस प्रकार हैं:

  • सबसे पहले विशेष मिट्टी लाकर उसे अच्छी तरह गूंथकर तैयार किया जाता है।
  • गांव के बाहर से घोड़ों के लिए मजबूत नाल बनवाई जाती है।
  • मिट्टी से घोड़ों के अलग-अलग हिस्सों को आकार देकर बनाया जाता है और अंत में उन्हें जोड़कर एक ढांचा तैयार किया जाता है।
  • पूरी तरह सूखने और पकने के बाद इन पर आकर्षक रंग-रोगन किया जाता है।

दूर-दूर तक है मांग

इन घोड़ों की ख्याति जालौर के अलावा बाड़मेर, बालोतरा, सिरोही और पड़ोसी राज्य गुजरात तक फैली हुई है। लोक देवता मामाजी, झुंझारजी या मल्लिनाथजी में अटूट आस्था रखने वाले श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर विशेष रूप से यहां आते हैं और इन घोड़ों को खरीदकर मंदिरों में अर्पित करते हैं। शिल्पकार रामलाल का कहना है कि पीढ़ियों से चली आ रही यह विरासत अब उनकी पहचान बन चुकी है। इस कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली है, जब अमेरिका से आए पर्यटकों ने भी इन मिट्टी के घोड़ों में रुचि दिखाई और उन्हें अपने साथ ले गए। आज भी यहां के कारीगर मशीनी युग में अपने हाथों के हुनर से इस प्राचीन परंपरा को गर्व के साथ जीवित रखे हुए हैं।

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