अजा एकादशी व्रत का विशेष महत्व
इस साल 7 सितंबर 2026 को अजा एकादशी का पवित्र व्रत रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अजा एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से साधक के सभी पापों का नाश होता है। जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति के लिए इस दिन व्रत का पालन करना अत्यंत फलदायी माना गया है। धर्म शास्त्रों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि एकादशी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक इसके साथ व्रत कथा का पाठ या श्रवण न किया जाए। कथा सुनने से ही व्रत की पूर्णता होती है।
राजा हरिश्चन्द्र और अजा एकादशी की पौराणिक कथा
प्राचीन पौराणिक गाथाओं के अनुसार, अयोध्या में राजा हरिश्चन्द्र नाम के एक प्रतापी सम्राट शासन करते थे। वे अपनी अटूट सत्यनिष्ठा, धर्मपरायणता और ईमानदारी के लिए पूरे संसार में प्रसिद्ध थे। एक बार देवताओं ने उनके सत्य की परीक्षा लेने का निर्णय लिया। राजा ने रात्रि के स्वप्न में देखा कि उन्होंने महर्षि विश्वामित्र को अपना पूरा राज्य दान में दे दिया है। जब अगली सुबह सूर्योदय हुआ, तो विश्वामित्र स्वयं उनके महल के द्वार पर उपस्थित हुए। उन्होंने राजा को स्वप्न की बात याद दिलाई और अपना दान मांगा। राजा हरिश्चन्द्र ने अपने सत्य के व्रत का पालन करते हुए बिना किसी संकोच के अपना समस्त राजपाट ऋषि को सौंप दिया।
दान की दक्षिणा चुकाने के लिए राजा हरिश्चन्द्र को अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। अपने पूर्व जन्म के कर्मों के फलस्वरुप उन्हें अपने परिवार, अपनी पत्नी और अपने इकलौते पुत्र को बेचना पड़ा। स्वयं राजा हरिश्चन्द्र ने एक चाण्डाल के यहाँ दास के रूप में कार्य करना स्वीकार किया। उनका कार्य श्मशान में आने वाले शवों के कफन एकत्रित करना था। इतनी विपरीत और कष्टकारी परिस्थितियों में भी राजा ने सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा। वे निरंतर अपने कर्तव्य का निर्वहन करते रहे।
कई वर्षों तक इस कठिन जीवन को जीने के बाद उन्हें अपने किए गए कर्मों पर अत्यधिक ग्लानि और दुख होने लगा। वे सदैव अपनी मुक्ति के उपाय के बारे में विचार करते रहते थे। इसी चिंता में डूबे हुए एक दिन उनके पास महर्षि गौतम का आगमन हुआ। हरिश्चन्द्र ने उन्हें अपने जीवन की व्यथा विस्तारपूर्वक सुनाई। उनकी पीड़ा को देखते हुए महर्षि गौतम ने उन्हें भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का व्रत करने का सुझाव दिया। महर्षि ने उन्हें आश्वस्त किया कि इस व्रत के प्रभाव से उनके सारे पाप स्वतः नष्ट हो जाएंगे।
व्रत का फल और प्राप्ति
महर्षि गौतम के परामर्श के अनुसार राजा हरिश्चन्द्र ने अजा एकादशी का व्रत विधानपूर्वक संपन्न किया और पूरी रात जागरण भी किया। इस व्रत की महिमा इतनी अद्भुत थी कि राजा के सभी पाप कट गए और उनके जीवन में पुनः खुशहाली लौट आई। व्रत के प्रभाव से उन्हें उनका खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त हुआ। अंत समय में राजा हरिश्चन्द्र अपने पूरे परिवार के साथ स्वर्ग लोक को गए। धार्मिक ग्रंथ बताते हैं कि जो भी श्रद्धालु श्रद्धा भाव से इस व्रत का पालन करते हैं, उनके समस्त दोष दूर हो जाते हैं। इतना ही नहीं, इस एकादशी व्रत की कथा का पाठ या श्रवण मात्र करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
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