खामोशी का मतलब बेरुखी नहीं
अक्सर बच्चे अपने पिता की खामोशी को नजरअंदाजी या कठोरता मान बैठते हैं, जिससे रिश्तों के बीच एक गहरी खाई बन जाती है। मनोविज्ञान के अनुसार, भावनाओं को व्यक्त न कर पाना या इमोशनल रिस्ट्रेंट का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि पिता के भीतर भावनाएं नहीं हैं। एक पिता के मन में भी अपने बच्चों के लिए प्यार का गहरा समंदर होता है, बस उन्हें इसे शब्दों के जरिए जाहिर करने का अभ्यास नहीं होता है।
क्यों नहीं कह पाते अपने जज्बात
ज्यादातर मामलों में इसके पीछे का कारण परवरिश और सामाजिक परवरिश होती है। पुरानी पीढ़ियों में पुरुषों को अक्सर यह सिखाया गया था कि भावनाओं को दिखाना कमजोरी की निशानी है। वे अक्सर इन कारणों से अपनी बात नहीं कह पाते:
- भावनाओं को दबाने की सामाजिक शिक्षा।
- अपनी जिम्मेदारी निभाने को ही प्यार का सबसे बड़ा रूप मानना।
- संवाद की कमी या खुलकर बात करने के माहौल का न होना।
प्यार जताने की अलग भाषा
पिता के प्यार को मापने का पैमाना सिर्फ 'आई लव यू' जैसे शब्द नहीं होने चाहिए। वे अपनी लव लैंग्वेज को शब्दों के बजाय कार्यों से साबित करते हैं। यह अक्सर कुछ ऐसे दिखता है:
- परिवार की सुरक्षा और जरूरतें पूरी करना।
- मुश्किल वक्त में चुपचाप साथ खड़ा रहना।
- बच्चों के भविष्य के लिए कठिन मेहनत करना।
जब बच्चे इस मनोवैज्ञानिक पक्ष को समझ लेते हैं, तो पिता के प्रति उनका नजरिया पूरी तरह बदल जाता है। यह खामोशी दूरी नहीं, बल्कि एक अलग तरह की सुरक्षा और निस्वार्थ प्रेम है जिसे समझने की जरूरत है।
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