मेले का घटता दायरा
भगवान शिव की नगरी काशी अपने सांस्कृतिक और पौराणिक मेलों के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है। जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर आयोजित होने वाला ऐतिहासिक रथयात्रा मेला भी इसी गौरवशाली परंपरा का हिस्सा है। हालांकि, आधुनिकता और शहरीकरण की दौड़ में इस मेले का स्वरूप काफी बदल गया है। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी यानी BHU के एक नवीनतम शोध में यह चिंताजनक खुलासा हुआ है कि जो मेला कभी 2 किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ था, वह अब सिमटकर महज 500 मीटर तक रह गया है।
क्यों कम हुई मेले की भव्यता
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस मेले के स्वरूप में आई इस गिरावट के पीछे कई प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं। शहरीकरण के कारण सड़कों का अतिक्रमण और बढ़ती आबादी ने मेले के विस्तार पर गहरा असर डाला है। एक समय था जब यह मेला दूर-दूर तक अपनी रौनक और भीड़ के लिए मशहूर था, लेकिन अब यह अपनी पुरानी भव्यता को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। शोध से पता चलता है कि न केवल मेले का क्षेत्रफल कम हुआ है, बल्कि इसमें आने वाली लाखों की भीड़ भी अब पहले की तुलना में काफी कम हो गई है।
सांस्कृतिक विरासत पर संकट
काशी की परंपरा में यह मेला न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह व्यापारिक और सामाजिक मेलजोल का भी एक बड़ा केंद्र था। BHU की इस रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि यदि समय रहते इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाले समय में इस तरह के ऐतिहासिक आयोजनों का अस्तित्व और भी खतरे में पड़ सकता है। स्थानीय लोग और प्रशासन अब इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि किस प्रकार से इस पुरानी परंपरा को पुनः जीवंत किया जाए और मेले के पुराने स्वरूप को वापस लाया जाए।
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