वह भारतीय जिसने ब्रिटिश संसद पहुंचकर हिला दी थी अंग्रेजों की नींव

दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद में पहुंचने वाले पहले भारतीय थे, जिन्होंने 1892 में लंदन की फिन्सबरी सेंट्रल सीट जीतकर इतिहास रच दिया था। उनकी इस ऐतिहासिक जीत ने उस दौर के ब्रिटिश शासकों के अहंकार को चकनाचूर कर दिया था।

इतिहास के पन्नों में दर्ज दादाभाई नौरोजी की विजय

आज के दौर में जब हम ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों को बड़े पदों पर देखते हैं, तो यह उपलब्धि हमें सामान्य लग सकती है। लेकिन गुलामी के उस दौर में जब भारतीयों को दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता था, तब ब्रिटिश संसद हाउस ऑफ कॉमन्स में एक अश्वेत भारतीय का प्रवेश किसी चमत्कार से कम नहीं था। यह गौरवपूर्ण कीर्तिमान दादाभाई नौरोजी ने 1892 में लंदन के फिन्सबरी सेंट्रल क्षेत्र से चुनाव जीतकर स्थापित किया था।

जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने किया था अपमान

दादाभाई नौरोजी ने पहली बार 1886 में चुनाव लड़ा था लेकिन उस समय उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उनका सफर आसान नहीं था। चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड सैलिसबरी ने खुलेआम उनका मजाक उड़ाते हुए उन्हें ‘काला आदमी’ कहा था। प्रधानमंत्री का यह नस्लीय बयान पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण बन गया, जिसने उदारवादी ब्रिटिश मतदाताओं को झकझोर दिया। नतीजतन, जनता ने दादाभाई के समर्थन में वोट किया और वे महज 3 वोटों के अंतर से जीतकर पहले भारतीय सांसद बने।

बाइबिल पर शपथ लेने से इनकार

संसद पहुंचने के बाद भी दादाभाई ने अपनी गरिमा बनाए रखी। तत्कालीन नियमों के अनुसार, शपथ के लिए बाइबिल पर हाथ रखना अनिवार्य था, लेकिन दादाभाई ने एक पारसी होने के नाते इससे साफ मना कर दिया। उन्होंने अपने धर्मग्रंथ खोर्डेह अवेस्ता की शपथ लेकर यह संदेश दिया कि वे ब्रिटिश शासन के पिछलग्गू नहीं, बल्कि एक स्वाभिमानी भारतीय हैं।

धन निष्कासन का सिद्धांत और भारत की आवाज

संसद के भीतर दादाभाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक पोवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया के जरिए अंग्रेजों के शोषण का पर्दाफाश किया। उन्होंने धन निष्कासन का सिद्धांत पेश करते हुए सांख्यिकीय आंकड़ों से साबित किया कि कैसे अंग्रेज भारत की संपदा को सोखकर ब्रिटेन को अमीर बना रहे हैं। उनके प्रयासों से जून 1893 में ब्रिटिश संसद ने भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षाएं भारत और इंग्लैंड में एक साथ आयोजित करने का प्रस्ताव पारित किया।

एक मार्गदर्शक के रूप में योगदान

दादाभाई नौरोजी ने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में बड़ी भूमिका निभाई और वे 1886, 1893 तथा 1906 में तीन बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में उन्होंने पहली बार आधिकारिक रूप से स्वराज की मांग उठाई। महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे बड़े नेता भी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। 30 जून 1917 को 91 वर्ष की आयु में इस महापुरुष का निधन हो गया, लेकिन वे भारतीयों के लिए एक प्रेरणा बनकर हमेशा जीवित रहेंगे।

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