योग के इतिहास पर नई रोशनी
International Yoga Day के खास मौके पर एक 125 वर्ष पुरानी दुर्लभ पांडुलिपि सामने आई है। इस ऐतिहासिक दस्तावेज ने योग की जड़ों को लेकर कई अहम खुलासे किए हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह खोज भारतीय योग परंपरा की व्यापकता को साबित करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रमाण है।
जैन परंपरा और योग का गहरा नाता
इस प्राचीन पांडुलिपि के अध्ययन से पता चलता है कि योग उस समय केवल शारीरिक कसरत तक ही सीमित नहीं था। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- यह दस्तावेज बताता है कि जैन मुनियों की आध्यात्मिक साधना और दैनिक दिनचर्या में योग की भूमिका बहुत अहम थी।
- पांडुलिपि में विभिन्न ध्यान पद्धतियों का विस्तार से उल्लेख किया गया है।
- इसमें उस दौर की अनुशासित जीवनशैली और योग क्रियाओं का सूक्ष्म वर्णन मौजूद है।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व
यह पांडुलिपि स्पष्ट करती है कि योग भारत की प्राचीन आध्यात्मिक विरासत का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह शोध न केवल योग के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी बताता है कि सदियों पहले भी भारत में योग को एक संपूर्ण जीवन पद्धति के रूप में अपनाया जाता था।
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