साउथ चाइना सी इन दिनों दुनिया की बड़ी ताकतों के टकराव का नया केंद्र बन चुका है। लंबे समय से चीन यहां अपना दबदबा कायम करने में जुटा था, लेकिन भारत की एंट्री ने पूरी बिसात ही पलट दी है। इस पूरी रणनीतिक उठापटक में भारत को अरबों रुपये का जो जबरदस्त फायदा मिला, उसकी असली वजह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की एक बड़ी भूल मानी जा रही है। ट्रंप के रवैये से इस इलाके में एक खालीपन पैदा हुआ, जिसे भारत ने बिना किसी शोरगुल के चुपचाप भर दिया और एक ही दांव से दो मकसद साध लिए।
ट्रंप की भूल और भारत को मिला मौका
दरअसल, अमेरिका की ट्रंप सरकार का ध्यान इंडो-पैसिफिक से हटकर पश्चिम एशिया की ओर खिसक गया है। इसी वजह से ताइवान को लेकर भी वाशिंगटन का रुख ढुलमुल पड़ गया। दशकों से जो छोटे देश चीन की दबंगई के सामने अमेरिका के भरोसे डटे थे, उन्हें अब महसूस हुआ कि ट्रंप की 'लेन-देन' वाली कूटनीति पर टिके रहना भारी पड़ सकता है।
जैसे ही अमेरिका ने अपने कदम पीछे खींचे, इस क्षेत्र में डर का माहौल गहराने लगा। ऐसे में भारत ने एक सच्चे और भरोसेमंद साथी के रूप में आगे बढ़कर यह कमी पूरी कर दी। अब भारत इन देशों को घातक मिसाइलों से लेकर ड्रोन और आधुनिक रडार सिस्टम तक हर जरूरी रक्षा साजो-सामान मुहैया करा रहा है।
'ब्रह्मोस' का जाल और चीन की बेचैनी
इस पूरे रणनीतिक दांव के केंद्र में भारत और रूस की साझा ताकत से तैयार 'ब्रह्मोस' मिसाइल है। यह दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जो आवाज की रफ्तार से तीन गुना तेजी से वार करती है। फिलीपींस को ब्रह्मोस की सफल आपूर्ति के बाद भारत ने अब वियतनाम के साथ भी इस मिसाइल की बहुत बड़ी डील पक्की कर ली है।
इंडोनेशिया भी बहुत जल्द इस सूची में जुड़ने वाला है, जबकि मलेशिया और थाईलैंड ने भी इसमें गहरी दिलचस्पी जताई है। अगर इन सभी देशों के समुद्री तटों पर भारत की ब्रह्मोस मिसाइलें तैनात हो गईं, तो साउथ चाइना सी में चीन के युद्धपोतों का खुलेआम घूमना तक नामुमकिन हो जाएगा।
अमेरिका को छोड़कर भारत की ओर क्यों झुके ये देश
अमेरिका जब भी किसी देश को अपने हाई-एंड हथियार बेचता है, तो उसके साथ राजनीतिक शर्तों का ढेर, मानवाधिकारों के उपदेश और तरह-तरह के प्रतिबंध भी थोप देता है। इसके उलट भारत का रवैया बेहद साफ और लचीला है। भारत खुद को एक 'फ्रेंडली डिफेंस पार्टनर' के रूप में पेश कर रहा है।
भारत सिर्फ घातक मिसाइलें ही नहीं बेच रहा, बल्कि इन देशों के सैनिकों को ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और मेंटेनेंस का पूरा नेटवर्क भी दे रहा है। यानी यह महज हथियारों का सौदा नहीं, बल्कि लंबे समय की साझेदारी है, जिससे ये देश आत्मनिर्भर बन सकें।
एक तीर से दो निशाने कैसे
साउथ चाइना सी में भारत का यह कदम केवल कारोबार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसकी 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' का सबसे बड़ा कूटनीतिक धमाका है। चीन हमेशा से पाकिस्तान और म्यांमार जैसे भारत के पड़ोसियों को हथियार देकर भारत को घेरने की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति अपनाता रहा है। अब भारत ने उसी की भाषा में जवाब देते हुए चीन के अपने ही इलाके में मजबूत साझेदार खड़े कर दिए हैं।
हथियारों की यह आपूर्ति भारत को पूरे क्षेत्र में एक बड़ा 'सिक्योरिटी प्रोवाइडर' बना रही है। इससे भविष्य में खुफिया जानकारी साझा करने और चीन के खिलाफ साझा सैन्य अभ्यास के रास्ते पूरी तरह खुल गए हैं। साथ ही भारत के लिए अरबों डॉलर के कारोबार और दुनिया की बड़ी मिलिट्री सुपरपावर बनने की राह भी साफ हो गई है।
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