गोवा क्रांति दिवस: 18 जून 1946 की वह क्रांति जिसने हिला दी पुर्तगाली हुकूमत की चूलें

18 जून 1946 को मडगांव के चौक पर डॉ. राममनोहर लोहिया और डॉ. जूलियाओ मेनेजेस ने पुर्तगाली शासन के खिलाफ आजादी का बिगुल फूंका था। इसी दिन को गोवा क्रांति दिवस के रूप में याद किया जाता है, जिसने आगे चलकर 1961 के ऑपरेशन विजय की राह तैयार की।

18 जून 1946 का दिन गोवा के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ बनकर दर्ज है। इस दिन मडगांव के चौक पर हजारों लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा था, जो अपनी आजादी की मांग को लेकर एकजुट हुए थे। यहीं गोवावासियों ने अपने भविष्य का फैसला खुद करने की ठानी थी। आज पूरा देश इस तारीख को गोवा क्रांति दिवस के रूप में याद करता है। इस जनआंदोलन ने 450 साल पुराने पुर्तगाली साम्राज्य की बुनियाद तक हिला दी थी।

दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी क्रांति की पटकथा भारत से हजारों किलोमीटर दूर जर्मनी में तैयार हुई थी। बर्लिन यूनिवर्सिटी में दो राष्ट्रवादी छात्रों की मुलाकात इस आंदोलन की नींव बनी। इनमें से एक थे गोवा के डॉ. जूलियाओ मेनेजेस और दूसरे उत्तर प्रदेश के डॉ. राममनोहर लोहिया। दोनों ने मिलकर पुर्तगाली हुकूमत के खिलाफ ऐसा मोर्चा खोला जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।

बर्लिन यूनिवर्सिटी में बुनी गई आजादी की रणनीति

इस कहानी की शुरुआत 1920 के दशक के अंतिम वर्षों से होती है। उस दौर में बर्लिन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान डॉ. मेनेजेस और डॉ. राममनोहर लोहिया की मुलाकात हुई। दोनों युवाओं के मन में अपने देश को स्वतंत्र देखने का बड़ा सपना पल रहा था।

पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. लोहिया साल 1933 में भारत लौट आए। इसके बाद डॉ. मेनेजेस भी 1938 में अपनी मेडिकल की डिग्री लेकर गोवा वापस आ गए। भौगोलिक दूरी जरूर बढ़ गई थी, लेकिन दोनों का मकसद एक ही बना रहा। वे लगातार संपर्क में रहे और रणनीति गढ़ते रहे।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब डॉ. लोहिया भूमिगत थे, तब डॉ. मेनेजेस ने ही उन्हें अपने यहां शरण दी थी। साल 1946 में जब डॉ. लोहिया की तबीयत बिगड़ी तो मेनेजेस उन्हें आराम के लिए गोवा ले आए। मगर वहां आराम के बजाय पुर्तगाली शासन को उखाड़ फेंकने की योजना आकार लेने लगी।

मडगांव के चौक पर उमड़ा जनसैलाब

गोवा के असोलना गांव में दोनों नेताओं के बीच गुप्त बैठकों का सिलसिला चल पड़ा। उस समय पुर्तगाली प्रशासन ने किसी भी प्रकार की सार्वजनिक सभा पर पूरी तरह रोक लगा रखी थी। इसके बावजूद 15 जून को दोनों नेताओं ने पणजी में एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया। यह पुर्तगाली कानून की खुली अवहेलना थी, जिसने लोगों में नया जोश भर दिया।

इसके बाद 18 जून 1946 को मडगांव के चौक पर एक विशाल जनसभा का आयोजन हुआ। पुलिस के डर को दरकिनार कर हजारों स्थानीय लोग इसमें शामिल हुए। मंच से डॉ. लोहिया और डॉ. मेनेजेस ने जनता को नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष का आह्वान किया।

डॉ. लोहिया ने जनसमूह के सामने खड़े होकर कहा, ‘आजादी कभी भीख में नहीं मिलती, बल्कि इसे संघर्ष से ही हासिल करना पड़ता है।’ इस ऐतिहासिक भाषण ने लोगों के भीतर दबे आक्रोश को एक बड़ी क्रांति में बदल दिया।

नेताओं की गिरफ्तारी और सड़कों पर भड़की जनक्रांति

पुर्तगाली सरकार ने शुरू में इस आंदोलन को बेहद हल्के में लिया था। लेकिन मडगांव की भीड़ देखकर अधिकारियों के होश उड़ गए। प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए डॉ. लोहिया और डॉ. मेनेजेस को गिरफ्तार कर लिया और चुपचाप पणजी के एक पुलिस स्टेशन में बंद कर दिया।

पुर्तगाली अधिकारियों को लगा कि नेताओं के जेल जाते ही आंदोलन ठंडा पड़ जाएगा। मगर उनका यह अनुमान पूरी तरह गलत साबित हुआ। अगले ही दिन यह खबर पूरे गोवा में जंगल की आग की तरह फैल गई। आम जनता सड़कों पर उमड़ पड़ी, जगह-जगह धरने शुरू हो गए और दोनों नेताओं की रिहाई की मांग जोर पकड़ने लगी।

इस भारी जनदबाव के आगे झुकते हुए प्रशासन को डॉ. लोहिया को गोवा की सीमा से बाहर छोड़ना पड़ा, जबकि डॉ. मेनेजेस को भी मडगांव में रिहा कर दिया गया।

ऑपरेशन विजय और 450 साल के राज का अंत

इस आंदोलन ने गोवावासियों के मन से विदेशी शासन का डर हमेशा के लिए मिटा दिया। साल 1947 में भारत को अंग्रेजों से आजादी तो मिल गई, लेकिन गोवा अब भी पुर्तगालियों के कब्जे में था। पुर्तगाली भारत में 1498 में वास्कोडिगामा के समय से ही जमे हुए थे और किसी भी कीमत पर गोवा छोड़ने को तैयार नहीं थे।

इसके बावजूद गोवा के लोगों का संघर्ष थमा नहीं। आखिरकार साल 1961 में भारत सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया। भारतीय सेना ने 19 दिसंबर 1961 को ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया और महज 36 घंटे के भीतर पुर्तगाली सेना ने भारतीय जांबाजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

इस तरह करीब साढ़े चार सौ साल पुराना दमनकारी शासन हमेशा के लिए खत्म हो गया। भारत इसे गोवा की मुक्ति मानता है, जबकि पुर्तगाल इसे अपने ऊपर हुए आक्रमण के रूप में देखता रहा।

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