अनिवार्य बचत के एक नियम ने सिंगापुर के आम नागरिकों को बनाया अमीर और घर का मालिक, भारत के लिए भी है बड़ी सीख

सिंगापुर में सैलरी से जबरन बचत करवाने वाले सेंट्रल प्रॉविडेंट फंड (CPF) ने वहां के नागरिकों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाया और घरों का मालिक बना दिया. यही अनुशासन आप भी अपनी ज़िंदगी में अपनाकर लंबे समय में संपत्ति बना सकते हैं.

क्या हर महीने की शुरुआत में आप भी पैसा बचाने का इरादा बनाते हैं, लेकिन महीना खत्म होते-होते जेब खाली हो जाती है? बचत का महत्व हम सब समझते हैं, मगर सोचिए अगर सरकार खुद आपकी तनख्वाह से जबरन कुछ हिस्सा काट ले तो? पहली बार सुनने में यह कदम भले ही दबावपूर्ण लगे, लेकिन इसी अनिवार्य बचत (Mandatory Saving) की बदौलत सिंगापुर ने अपने लोगों को दुनिया के सबसे संपन्न और सुरक्षित नागरिकों में शामिल कर दिया.

महीने की पहली तारीख को जब मोबाइल पर सैलरी क्रेडिट होने (Salary Credited) का संदेश आता है, तो सबसे पहले मन में क्या आता है? नए कपड़े, वीकेंड की कोई यात्रा या किसी पसंदीदा रेस्टोरेंट में डिनर? असल में हममें से ज्यादातर लोग एक गलत आदत के शिकार हैं—पहले खर्च करते हैं और जो बचता है उसे ही बचत मान बैठते हैं. नतीजा यह होता है कि आखिर में कुछ बचता ही नहीं. इंसानी स्वभाव की इसी कमजोरी को सिंगापुर ने दशकों पहले भांप लिया था. जहां दुनिया भर की सरकारें लोगों को जागरूक कर बचत के लिए प्रेरित करती हैं, वहीं सिंगापुर ने बचत को कानूनन जरूरी बना दिया. शुरुआत में सख्त और बंधनकारी लगने वाला यह नियम आज वहां के नागरिकों के लिए वरदान बन चुका है. भारत में ऐसा कोई नियम नहीं है, फिर भी इसे अपनी आदत में ढालकर आप समृद्धि की राह पकड़ सकते हैं.

1955 में पड़ी थी इस फंड की नींव

यह बात सन 1955 की है, जब सिंगापुर आज की तरह आधुनिक और समृद्ध नहीं था. ब्रिटिश शासनकाल में वहां सेंट्रल प्रॉविडेंट फंड (Central Provident Fund – CPF) की शुरुआत हुई थी. शुरू में इसका एकमात्र उद्देश्य कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा देना था. लेकिन 1959 में जब ली कुआन यू (Lee Kuan Yew) के नेतृत्व वाली नई सरकार सत्ता में आई, तो उसने इसी योजना को देश के निर्माण का प्रमुख औजार बना दिया.

सरकार ने नियम बनाया कि हर नौकरीपेशा व्यक्ति को अपनी सैलरी का एक तय हिस्सा इस फंड में जमा करना होगा और उतना ही योगदान उसकी कंपनी (Employer) को भी देना होगा. उम्र के आधार पर यह हिस्सा 20% तक हो सकता था. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सिंगापुर के नागरिकों के लिए यह कोई विकल्प नहीं बल्कि एक कानूनी अनिवार्यता थी. लोग इस रकम को अपनी इच्छा से नहीं निकाल सकते थे; इसका प्रबंधन सरकार करती थी—ठीक वैसे ही जैसे हमारी-आपकी सैलरी का एक हिस्सा पीएफ (Provident Fund) में जाता है.

बुढ़ापा, मकान और इलाज के लिए तीन अलग खाते

सिंगापुर ने इस पैसे को किसी तिजोरी में बंद करके नहीं रखा, बल्कि उसे नागरिकों की असली जरूरतों से जोड़ दिया. CPF के तहत जमा होने वाली रकम तीन अलग-अलग खातों में बंटती थी:

  • ऑर्डिनरी अकाउंट (Ordinary Account): इस पैसे का उपयोग नागरिक घर खरीदने, शिक्षा और निवेश के लिए कर सकते थे.
  • स्पेशल अकाउंट (Special Account): यह रकम बुढ़ापे के लिए सुरक्षित रखी जाती थी और इस पर सरकार बेहतर ब्याज देती थी.
  • मेडिसेव अकाउंट (Medisave Account): यह हिस्सा सिर्फ इलाज और स्वास्थ्य से जुड़े खर्चों के लिए आरक्षित रहता था.

इस व्यवस्था का असर यह हुआ कि बीमारी, बच्चों की पढ़ाई या घर खरीदने के लिए लोगों को कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ा.

दुनिया में सबसे ऊंची होमओनरशिप दर

इस नीति का सबसे क्रांतिकारी प्रभाव वहां के रियल एस्टेट और रेजिडेंशियल सेक्टर पर पड़ा. आज सिंगापुर में घर के मालिकों की दर करीब 89.3% है, जो दुनिया में सबसे अधिक है. यानी लगभग 90 प्रतिशत लोगों के पास अपना खुद का घर है. यह आंकड़ा डिपार्टमेंट ऑफ स्टैटिस्टिक्स सिंगापुर की रिपोर्ट पर आधारित है.

आमतौर पर किसी भी देश में मध्यवर्गीय व्यक्ति के लिए अपना घर खरीदना जीवन का सबसे बड़ा और तनावभरा फैसला होता है. भारत में भी यह किसी सपने से कम नहीं. लेकिन सिंगापुर के नागरिकों ने अपने CPF के ऑर्डिनरी अकाउंट में जमा रकम का इस्तेमाल सरकारी हाउसिंग एंड डेवलपमेंट बोर्ड (HDB) के फ्लैट खरीदने में किया. इसका परिणाम यह रहा कि किसी अतिरिक्त कर्ज के बोझ के बिना देश की लगभग पूरी आबादी अपने घरों की मालिक बन गई, जिससे समाज में एक अभूतपूर्व आर्थिक स्थिरता आई.

आम आदमी के लिए क्या है सबक?

सिंगापुर की यह कामयाबी पर्सनल फाइनेंस का एक अहम पाठ पढ़ाती है—अमीर बनने या आर्थिक रूप से सुरक्षित होने के लिए केवल ज्यादा कमाना काफी नहीं, बल्कि सही फैसले लेना जरूरी है. मोटिवेशन कुछ ही दिनों में खत्म हो जाती है और अनुशासन भी समय के साथ डगमगा सकता है. लेकिन अगर आप ऐसा सिस्टम बना लें, जहां आपके सोचने से पहले ही पैसा सही जगह निवेश हो जाए, तो लंबे समय में संपत्ति अपने आप बनती चली जाती है.

आज के दौर में हम भी अपने जीवन में ‘सिंगापुर मॉडल’ अपना सकते हैं. सैलरी आते ही ऑटो-डेबिट (Auto-Debit) के जरिए म्यूचुअल फंड SIP, पीपीएफ (PPF) या नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में पैसा ट्रांसफर करने की आदत डालें. जब पैसा हाथ में दिखेगा ही नहीं, तो फिजूलखर्ची अपने आप थम जाएगी.

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