गूगल का 80 अरब डॉलर का दांव और उदय कोटक की चेतावनी—'आईपीएल का मजा खत्म, अब भविष्य पर नजर डालो'

नकदी से भरी और भारी मुनाफा कमाने वाली गूगल अतिरिक्त 80 अरब डॉलर जुटा रही है। उदय कोटक ने इसी का हवाला देकर भारतीय कंपनियों को सतर्क किया है कि वे भविष्य के लिए निवेश बढ़ाएं।

दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय ऐसे मोड़ पर है, जहां आने वाले कल की दिशा आज लिए जा रहे फैसलों से तय हो रही है। टेक्नोलॉजी, पूंजी और निवेश की होड़ अब पहले से कहीं ज्यादा तीखी हो चुकी है। ऐसे ही माहौल में गूगल का ताजा कदम बेहद अहम माना जा रहा है। जिस कंपनी के पास पहले से विशाल नकद भंडार है और जो लगातार मुनाफे के नए कीर्तिमान गढ़ रही है, वही अब बाजार से अतिरिक्त 80 अरब डॉलर जुटाने जा रही है।

उदय कोटक ने अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इसी ओर लोगों का ध्यान खींचा है और देसी कंपनियों को आगाह किया है कि आईपीएल का मजा खत्म हो चुका है, अब भविष्य की तरफ नजर डालने का समय है।

गूगल के आंकड़े क्यों चौंकाते हैं

गूगल से जुड़े आंकड़े अपने आप में हैरान कर देने वाले हैं। कंपनी का सालाना मुनाफा करीब 160 अरब डॉलर है, एक तिमाही का मुनाफा 62 अरब डॉलर है और कुल मार्केट वैल्यू 4.5 खरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। इतना बड़ा मार्केट कैप तो निफ्टी 50 और सेंसेक्स की कंपनियों को एक साथ जोड़ने पर भी नहीं बनता।

उदय कोटक ने अपनी पोस्ट में लिखा कि नकदी से भरी गूगल ने अभी 80 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी जुटाने का ऐलान किया है। कंपनी का सालाना मुनाफा 160 अरब डॉलर, पिछली तिमाही का मुनाफा 62 अरब डॉलर और मार्केट कैप 4.5 ट्रिलियन डॉलर है—जो सभी भारतीय लिस्टेड कंपनियों के कुल मुनाफे और मार्केट कैप के लगभग बराबर है। उन्होंने इसे एक 'वेक-अप कॉल' बताया।

असल सवाल: हम क्या कर रहे हैं

यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब इतनी बड़ी और मजबूत कंपनी भी भविष्य को लेकर इतनी आक्रामक तैयारी कर रही है, तो हम क्या कर रहे हैं। क्या हम भी उतनी ही तत्परता और दूरदृष्टि दिखा पा रहे हैं?

अपनी स्थिति पर गौर करें तो एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। एक ओर राजनीतिक स्थिरता और ताकत अपने चरम पर है—मजबूत नेतृत्व, लगातार चुनावी जीत और लगभग एकदलीय प्रभुत्व जैसी स्थिति। कुल मिलाकर मोदी सरकार बेहद स्थिर मानी जा रही है। दूसरी ओर आर्थिक मोर्चे पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं और ईरान युद्ध ने चुनौतियों को और बढ़ा दिया है।

विकास दर की चमक के पीछे की हकीकत

विकास दर भले ही स्थिर दिखती हो, पर तीन बातें लगातार चिंता पैदा कर रही हैं। कुछ लोगों को आर्थिक हालात के कमजोर पड़ने की बात रास नहीं आती और वे तुरंत याद दिलाते हैं कि भारत बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज बढ़ने वाला देश है तथा हमारी जीडीपी 6 परसेंट से ऊपर है।

लेकिन तस्वीर इतनी चमकदार नहीं है। दुनिया के सभी देशों पर नजर डालें तो भारत से ज्यादा जीडीपी वृद्धि दर नाइजर और इथियोपिया की है। प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के मामले में भी हम आठवें स्थान पर हैं और बांग्लादेश हमसे आगे निकल चुका है।

कमजोर होता रुपया

हाल में पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग के चलते रुपया पिछले एक साल में करीब 12% गिर चुका है, और यह लगातार सातवां साल है जब इसमें गिरावट दर्ज हुई है। हालात अपने आप में अजीब हैं—महंगाई काबू में है, चालू खाता घाटा संतुलित है और विकास की रफ्तार भी ठीक मानी जा रही है, फिर भी मुद्रा कमजोर बनी हुई है।

निवेश ही असली इंजन

आर्थिक विकास का असली इंजन निवेश ही होता है, खासकर प्राइवेट इन्वेस्टमेंट और विदेशी निवेश (FDI)। यही निवेश नई टेक्नोलॉजी लेकर आता है, रोजगार पैदा करता है और देश को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ता है। मगर अपने देश में निजी क्षेत्र का निवेश उस रफ्तार से नहीं बढ़ रहा। सरकार ने बजट में विकास कार्यों के लिए 11 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, लेकिन केवल सरकारी निवेश से काम नहीं चलेगा।

इस पूरी तस्वीर को गूगल के उदाहरण से जोड़कर देखें तो अंतर साफ झलकता है। वहां कंपनियां इस मान्यता के साथ आगे बढ़ रही हैं कि भविष्य अनिश्चित है, प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और टेक्नोलॉजी तेजी से बदलेगी, इसलिए अभी से निवेश बढ़ाना जरूरी है। वहीं भारत में अक्सर यह धारणा हावी रहती है कि हमारा बाजार इतना बड़ा है कि निवेशक खुद-ब-खुद चले आएंगे। जबकि सच्चाई यह है कि निवेशक भरोसे और रिटर्न की गारंटी मिलने पर ही आते हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं

सीआईआई की रिपोर्ट के मुताबिक निजी क्षेत्र ने सितंबर में 7.7 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है, जो एक अच्छा संकेत है। लेकिन पिछले एक दशक के आंकड़ों पर गौर करें तो कॉरपोरेट निवेश जीडीपी के 12 प्रतिशत पर ही ठहरा हुआ है। इसे हर हाल में बढ़ाना होगा।

हमारे पास एक विशाल बाजार, युवा आबादी, तेजी से फैलता डिजिटल इकोसिस्टम और वैश्विक स्तर पर बढ़ती रणनीतिक अहमियत है। मगर असली चुनौती इन बढ़त को ठोस आर्थिक ताकत में बदलने की है।

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