कहते हैं कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती, और इस कहावत को बलिया के एक बेटे ने सच कर दिखाया है। जहां ऊंचाई पर सांसें थमने लगती हैं और बर्फीले तूफान हौसले की परीक्षा लेते हैं, वहां जिले के एक युवा ने अपने जुनून और जज्बे के दम पर नई इबारत लिखी है। बलिया जिले के करनई गांव के युवा पर्वतारोही अनिल यादव ने हिमाचल प्रदेश की 6111 मीटर ऊंची माउंट यूनाम चोटी पर तिरंगा लहरा दिया है। कठिन मौसम, खतरनाक रास्तों और तमाम चुनौतियों को पार करते हुए उन्होंने यह साबित कर दिया कि बुलंद इरादों के सामने पहाड़ भी झुक जाते हैं।
अनिल अपनी दो असफलताओं के बावजूद हताश नहीं हुए और तीसरी बार में उन्हें कामयाबी मिली। अब उनका सपना दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का है।
कैसे जागा पर्वतारोहण का सपना
अनिल यादव बताते हैं कि उनकी ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई गृह जनपद में ही हुई। उनका कहना है कि बलिया की मिट्टी में बागीपन तो है, लेकिन अब तक यहां का कोई व्यक्ति दुनिया की किसी ऊंची चोटी पर नहीं चढ़ा था। अचानक उनके मन में विचार आया कि क्यों न इसी क्षेत्र में रिकॉर्ड बनाया जाए, और इसी सोच के साथ उन्होंने पर्वतारोहण की राह पकड़ ली।
काफी प्रयास के बाद उन्हें प्रसिद्ध संस्थान दार्जिलिंग हिमालयन पर्वतारोहण संस्थान में प्रवेश मिला, जहां से उन्होंने A ग्रेड हासिल किया। इसके बाद वे मनाली लौटे और अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं संबद्ध खेल संस्थान (ABVIMAS), मनाली से AMC का कोर्स किया, जिसमें खतरनाक चट्टानों और सीधी बर्फ की दीवारों पर चढ़ने की उन्नत तकनीकें सिखाई जाती हैं। इसके बाद उन्होंने Master Of Instructor का कोर्स भी पूरा किया।
जब दिशा का पता ही नहीं चलता
हाल ही में अनिल माउंट यूनाम (ऊंचाई 6111 मीटर) फतह कर लौटे हैं। वहां हाड़ कंपा देने वाली ठंड थी। हालत यह थी कि थर्मस का गर्म पानी एक घंटे में बर्फ बन गया। पूरी टीम को प्यास लगी और सभी लोग बीच मझधार में फंस गए। नीचे लौटना भी संभव नहीं था, क्योंकि ऐसा करने पर लक्ष्य अधूरा रह जाता।
सुबह होते ही चोटी पर पहुंचना जरूरी था, वरना बर्फीली चोटियों पर व्हाइटआउट (Whiteout) का खतरा था। यह एक खतरनाक मौसमी स्थिति है, जिसमें बर्फ, कोहरे या बादलों के कारण दृश्यता लगभग शून्य हो जाती है। ऐसे में जमीन और आसमान एक जैसे सफेद नजर आने लगते हैं, क्षितिज गायब हो जाता है और दिशा तक का पता नहीं चलता।
इस कठिन स्थिति में हौसला बनाए रखते हुए अनिल ने अपने साथियों के साथ चोटी पर भारत का झंडा फहराया। उन्होंने रात 9 बजे चढ़ाई शुरू की थी और अगले दिन सुबह 9 बजे झंडा लहरा दिया।
'हर कदम पर रहता है डर'
अनिल बताते हैं कि चोटी पर हर कदम पर डर लगा रहता है। ऊपर से लगता है कि बर्फ है, लेकिन उसके नीचे पानी होता है। पैर अचानक नीचे धंस जाता है और फिर टीम की मदद से ही व्यक्ति को बाहर निकाला जाता है। कई बार ये कदम बेहद खतरनाक साबित होते हैं।
दो दिन तक फंसे रहे, दोस्त की हुई मौत
अनिल बताते हैं कि पिछले साल अगस्त में वे लेह-लद्दाख स्थित माउंट नून (ऊंचाई 7135 मीटर) पर जा रहे थे, जिसे प्री एवरेस्ट कहा जाता है। नियमानुसार एवरेस्ट जाने से पहले उन्होंने इस पर चढ़ाई का प्रयास किया, लेकिन हिमालय के तीसरे कैंप पर इतनी बर्फबारी हुई कि वे लोग दो दिन तक ऊपर ही फंसे रहे। बहुत ज्यादा ठंड के कारण उनके बंगाली मित्र की वहीं मौत हो गई।
तमाम जोखिमों और हादसों के बावजूद अनिल का हौसला कम नहीं हुआ है। अब उनका एक ही सपना है — माउंट एवरेस्ट को फतह करना।
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