झुमकों के लिए दुनिया भर में मशहूर बरेली की एक और ऐतिहासिक पहचान है, जिसने बरसों से लोगों के दिलों में खास जगह बनाई हुई है। यह पहचान है बरेली के पारंपरिक सुरमे की। किसी दौर में हर घर की जरूरत समझा जाने वाला यह सुरमा आज भी अपनी विरासत को बखूबी संभाले हुए है। हालांकि बदलती जीवनशैली और आधुनिक सोच के बीच इसके इस्तेमाल को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं भी सामने आती रहती हैं।
कंपनी की नींव और यूनानी ज्ञान की परंपरा
बरेली की प्रसिद्ध संस्था कादरी सुरमा एंड कंपनी के प्रोप्राइटर ने बताया कि उनकी कंपनी की स्थापना हकीम मोहम्मद अहमद कादरी ने की थी। उन्होंने यूनानी चिकित्सा और हिकमत के ज्ञान के आधार पर सुरमा निर्माण की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया। प्रोप्राइटर का दावा है कि उनकी कंपनी में तैयार होने वाले विभिन्न प्रकार के सुरमे आज देश और विदेश दोनों जगह उपयोग किए जाते हैं।
चिकित्सकों के बीच बनी धारणा पर क्या है पक्ष
मौजूदा समय में कुछ लोगों और चिकित्सकों के बीच यह धारणा बन गई है कि सुरमा आंखों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। हालांकि प्रोप्राइटर का कहना है कि पारंपरिक सुरमा प्राकृतिक तत्वों से तैयार किया जाता है और इसकी निर्माण प्रक्रिया वर्षों पुरानी यूनानी चिकित्सा पद्धति पर आधारित है। उनका मानना है कि असली व प्राकृतिक सुरमे को मिलावटी उत्पादों से अलग पहचानना बेहद आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि बाजार में कई बार काले रंग को ज्यादा आकर्षक दिखाने के लिए सामान्य काजल या दूसरे पदार्थों को सुरमे के नाम पर बेच दिया जाता है, जिससे लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है।
सुरमे के सही इस्तेमाल का तरीका
प्रोप्राइटर के अनुसार उपभोक्ताओं को खरीदारी के समय गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर खास ध्यान देना चाहिए। बातचीत के दौरान उन्होंने सुरमा लगाने के सही तरीके पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक पारंपरिक रूप से सुरमा आंखों के अंदरूनी हिस्से में लगाया जाता है। उन्होंने दावा किया कि सही ढंग से उपयोग किए जाने पर यह आंखों की देखभाल में सहायक हो सकता है।
इसके साथ ही उन्होंने अपनी कंपनी के “मोमीरा सुरमा” समेत कई उत्पादों का जिक्र भी किया, जिन्हें ग्राहक लंबे समय से पसंद करते आ रहे हैं। हालांकि आंखों से जुड़ी किसी भी समस्या या उपचार के लिए विशेषज्ञ नेत्र चिकित्सक की सलाह लेना जरूरी माना जाता है।
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