छत्तीसगढ़ में खरीफ सीजन की तैयारियां जोरों पर हैं और किसान इन दिनों धान की बुआई की योजना बनाने में व्यस्त हैं। राज्य के कई हिस्सों में ऐसी जमीनें हैं, जहां बरसात के मौसम में लंबे समय तक पानी भरा रहता है। ऐसे निचले इलाकों में धान की खेती करना किसानों के लिए हमेशा से मुश्किल भरा काम रहा है। यही वजह है कि कृषि विशेषज्ञ अब किसानों को जलभराव वाली जमीन के हिसाब से उपयुक्त धान किस्म चुनने की सलाह दे रहे हैं, ताकि पैदावार पर असर न पड़े और आर्थिक नुकसान से बचा जा सके।
निचले इलाकों में क्यों होती है समस्या
कृषि विज्ञान केंद्र बालोद के विषय वस्तु विशेषज्ञ ए. आर. गौर के अनुसार, छत्तीसगढ़ के कई निचले हिस्सों में बारिश के दौरान खेतों में पानी जमा हो जाता है। स्थानीय भाषा में ऐसी जमीन को बाहरा जमीन कहा जाता है। यहां जब किसान धान की सामान्य किस्म लगाते हैं, तो पौधों की जड़ें लंबे समय तक पानी में डूबी रहती हैं। इससे जड़ें सड़ने लगती हैं और पौधे कमजोर पड़कर गिर जाते हैं। इसका असर सीधे उत्पादन पर पड़ता है और किसानों को नुकसान झेलना पड़ता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
ए. आर. गौर का कहना है कि ऐसे जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए जलडुबी धान एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती है। यह किस्म खासतौर पर उन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, जहां खेतों में लगातार पानी भरा रहता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि अधिक पानी में भी पौधों की जड़ें सुरक्षित रहती हैं और फसल की बढ़वार सामान्य रूप से जारी रहती है।
150 से 155 दिनों में तैयार होती है फसल
विशेषज्ञ के मुताबिक, जलडुबी धान की यह किस्म करीब 150 से 155 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 20 से 25 क्विंटल प्रति एकड़ आंकी जाती है, जो जलभराव वाली जमीन के लिहाज से अच्छी पैदावार मानी जाती है। यह किस्म खासतौर पर उन किसानों के लिए लाभकारी है, जिनके खेत नालों, नदी किनारों या ऐसे इलाकों में हैं जहां बारिश के बाद बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं।
किसानों से अपील
उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे अपने खेत की भौगोलिक स्थिति और पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखकर ही धान की किस्म का चुनाव करें। उनका कहना है कि सही किस्म का चयन न सिर्फ पैदावार बढ़ाने में मददगार होता है, बल्कि खेती में आने वाले जोखिम और संभावित नुकसान को भी काफी हद तक घटा देता है।
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