कोलकाता से थाईलैंड तक हाईवे की तैयारी, घबराए चीन ने म्यांमार पर लुटाया प्यार, 18 समझौतों का जाल

भारत और म्यांमार के बीच त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान प्रोजेक्ट पर बनी सहमति से चीन बेचैन है। जवाबी चाल में शी जिनपिंग ने म्यांमार के राष्ट्रपति को बीजिंग बुलाकर 18 समझौतों पर हस्ताक्षर करा लिए।

दक्षिण-पूर्व एशिया में चल रही वर्चस्व की लड़ाई के बीच भारत और म्यांमार के बीच मजबूत होते रिश्तों ने चीन की चिंता बढ़ा दी है। खासकर भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग (Trilateral Highway) को लेकर बनी सहमति ने बीजिंग को बेचैन कर दिया है। भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति का तोड़ निकालने के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आनन-फानन में म्यांमार के राष्ट्रपति को बीजिंग बुलाकर 18 समझौतों का जाल बिछा दिया है।

भारत-म्यांमार की नजदीकियों से सहमा ड्रैगन

हिंद महासागर में जिस देश को चीन अपने हथियार की तरह इस्तेमाल करने की योजना बना रहा था, उसी म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग ने भारत के साथ अहम समझौते कर लिए हैं। जैसे ही यह खबर सामने आई कि कोलकाता से थाईलैंड तक ऐसा हाईवे बनने वाला है, जो पूरे पूर्वोत्तर भारत की तस्वीर बदल सकता है, चीन के कान खड़े हो गए। म्यांमार के साथ हुई यह डील भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति का बड़ा कदम मानी जा रही है। इसी से घबराकर जिनपिंग ने तुरंत म्यांमार के राष्ट्रपति को बीजिंग बुला लिया और हूबहू वैसे ही समझौते करने की कोशिश की।

कब शुरू हुई यह कूटनीतिक होड़

एशिया में चल रही इस पावर स्ट्रगल की शुरुआत 30 मई 2026 से हुई, जब म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग अचानक भारत के बिहार स्थित बोधगया हवाई अड्डे पर उतरे। साल 2021 के तख्तापलट के बाद दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों ने म्यांमार से दूरी बना ली थी, लेकिन भारत ने खुले दिल से उनका स्वागत किया। भारत की यह कूटनीति इतनी सटीक रही कि म्यांमार के राष्ट्रपति ने अपने पहले बड़े आधिकारिक विदेश दौरे के लिए चीन को नहीं, बल्कि भारत को चुना।

30 मई से 3 जून 2026 तक चली इस पांच दिवसीय बैठक में कई ऐसी डील्स को अंतिम रूप दिया गया, जिन्होंने चीन की महत्वाकांक्षाओं को झटका दिया। भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह म्यांमार के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, बल्कि एक पड़ोसी के नाते हर मोर्चे पर साथ खड़ा रहेगा।

दो प्रोजेक्ट, जिनसे बौखलाया चीन

प्रधानमंत्री मोदी और म्यांमार के राष्ट्रपति के बीच दो बेहद अहम और गेम-चेंजर कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स पर बात हुई, जो सीधे चीन के दबदबे को चुनौती देते हैं।

भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग: यह कोई मामूली सड़क नहीं, बल्कि करीब 1,360 किलोमीटर लंबा महा-कॉरिडोर है, जो मणिपुर के मोरे को म्यांमार के रास्ते सीधे थाईलैंड के माई सॉट से जोड़ेगा। भविष्य में इस सड़क को कंबोडिया, लाओस और वियतनाम तक ले जाने की योजना है। यानी कोलकाता से गाड़ी में बैठकर सीधे थाईलैंड और वियतनाम तक का सफर संभव हो सकेगा। यह डील जमीन पर उतरने के करीब पहुंचते ही चीन को समझ आ गया कि दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों पर उसकी पकड़ कमजोर पड़ सकती है।

कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट: यह प्रोजेक्ट कोलकाता बंदरगाह को समुद्र के रास्ते म्यांमार के सितवे (Sittwe) पोर्ट से जोड़ता है और वहां से नदी एवं सड़क मार्ग के जरिए सीधे मिजोरम तक पहुंच देता है। इसका समुद्री हिस्सा चालू हो चुका है और भारत सरकार ने साल 2027 तक इसके पहाड़ी सड़क मार्ग को पूरा करने का लक्ष्य रखा है।

म्यांमार के आंतरिक गृहयुद्ध की वजह से इन दोनों प्रोजेक्ट्स में देरी हो रही थी, लेकिन इस बार म्यांमार के राष्ट्रपति ने पीएम मोदी को भरोसा दिलाया कि उनकी सेना इन रास्तों को सुरक्षित करने और काम तेजी से पूरा करने के लिए 'सब कुछ' करेगी। म्यांमार का यही वादा चीन की घबराहट की सबसे बड़ी वजह बना।

बीजिंग में बिछाया गया रेड कारपेट

भारत से म्यांमार के राष्ट्रपति के लौटते ही शी जिनपिंग ने उन्हें तुरंत बीजिंग आने का न्योता भेज दिया। 16 जून 2026 को म्यांमार के राष्ट्रपति जैसे ही बीजिंग पहुंचे, चीन ने 'ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल' में उनके लिए रेड कारपेट बिछाकर भव्य स्वागत समारोह किया। चीन की बेचैनी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बंद कमरे में एक घंटे से भी कम चली मुलाकात के तुरंत बाद जिनपिंग ने म्यांमार के सैन्य नेतृत्व को कूटनीतिक मान्यता दे दी। उन्होंने वही वादा दोहराया, जो कुछ दिन पहले भारत ने किया था। जिनपिंग ने कहा कि बीजिंग अपनी पड़ोसी कूटनीति में म्यांमार को सबसे ऊपर रखता है और उसकी सुरक्षा, विकास तथा स्थिरता के लिए हर संभव मदद को तैयार है।

चीन ने फेंका 18 समझौतों का जाल

भारत की 'कोलकाता से थाईलैंड' वाली सड़क का तोड़ निकालने के लिए चीन ने म्यांमार के सामने समझौतों की झड़ी लगा दी। दोनों नेताओं की मौजूदगी में 18 मेमोरेन्डम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर हस्ताक्षर किए गए। चीन ने उन्हीं क्षेत्रों को निशाना बनाया, जहां भारत मजबूत हो रहा था।

  • ग्रेटर मेकांग क्रॉस-बॉर्डर ट्रांसपोर्ट: भारत के त्रिपक्षीय राजमार्ग के मुकाबले चीन ने म्यांमार के साथ मिलकर मेकांग उप-क्षेत्र में सीमा पार परिवहन नेटवर्क को और मजबूत करने का समझौता किया, ताकि चीनी सामान म्यांमार के रास्ते हिंद महासागर तक पहुंच सके।
  • उत्तरी म्यांमार में स्थिरता का दांव: म्यांमार का जो उत्तरी हिस्सा भारत और चीन की सीमाओं से सटा है, वहां चल रहे गृहयुद्ध को शांत करने के लिए चीन ने मध्यस्थ बनने की पेशकश की। जिनपिंग ने कहा कि चीन सभी विद्रोही गुटों को बातचीत की मेज पर लाने और वहां दीर्घकालिक शांति बनाने में मदद करेगा, ताकि चीनी प्रोजेक्ट्स तेजी से आगे बढ़ सकें।
  • फ्री ट्रेड: भारत ने म्यांमार के साथ 'रुपया-क्यात' (Rupee-Kyat) पेमेंट मैकेनिज्म पर बात की थी, तो चीन ने जवाबी चाल चलते हुए फ्री ट्रेड और आपदा प्रबंधन के नाम पर म्यांमार को भारी आर्थिक मदद का लालच दे दिया।

डॉलर और चीनी वर्चस्व को दोहरा झटका

इस कूटनीतिक जंग में भारत ने सिर्फ सड़कों का जाल ही नहीं बिछाया, बल्कि आर्थिक और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी चीन को कड़ी टक्कर दी है। साल 2025-26 में भारत और म्यांमार का द्विपक्षीय व्यापार करीब 1.95 अरब डॉलर रहा। इस व्यापार को और बढ़ाने के लिए भारत ने रुपये और क्यात में सीधे लेनदेन की व्यवस्था शुरू करने का समझौता किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि इस व्यापार से डॉलर और चीनी युआन, दोनों बाहर हो जाएंगे, जिससे चीन का आर्थिक वर्चस्व कमजोर होगा।

इसके अलावा, भारत ने म्यांमार की सीमा पर सक्रिय साइबर क्राइम नेटवर्क और विद्रोही गुटों पर नकेल कसने के लिए भी म्यांमार सरकार के साथ हाथ मिलाया है। पिछले 18 महीनों में म्यांमार के स्कैम सेंटर्स से 2,400 से ज्यादा भारतीयों को छुड़ाया जा चुका है। सुरक्षा के मोर्चे पर म्यांमार ने भारत को भरोसा दिया है कि वह अपनी धरती का इस्तेमाल कभी भी भारत विरोधी ताकतों के लिए नहीं होने देगा।

म्यांमार बना एशिया का नया 'शतरंज'

भारत और चीन की इन दो बैक-टू-बैक हाई-प्रोफाइल मुलाकातों ने म्यांमार को दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे बड़ा अखाड़ा बना दिया है। म्यांमार के लिए भी यह स्थिति फायदेमंद है, क्योंकि वह जानता है कि चीन पर हद से ज्यादा निर्भरता आत्मघाती हो सकती है, इसलिए वह भारत को एक मजबूत आर्थिक और कूटनीतिक संतुलन के रूप में देख रहा है। लेकिन चीन की असली चिंता यह है कि अगर भारत का तीन देशों को जोड़ने वाला हाईवे और कलादान प्रोजेक्ट पूरी तरह चालू हो गए, तो भारत का लैंडलॉक पूर्वोत्तर क्षेत्र सीधे आसियान (ASEAN) देशों से जुड़ जाएगा। यह भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति की सबसे बड़ी जीत होगी।

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