किशाऊ बांध परियोजना: 85 साल, 7 राज्य, 11500 करोड़ की लागत और 17 गांवों पर पलायन की मार, क्यों अधूरा है यह ‘नेशनल प्रोजेक्ट’

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में टौंस नदी पर प्रस्तावित 660 मेगावाट की किशाऊ बांध परियोजना 85 साल बाद भी हकीकत से दूर है। इस परियोजना की जद में दोनों राज्यों के 17 गांव आएंगे और हजारों लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में यमुना की सहायक टौंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना का सफर आसान नहीं रहा है। 660 मेगावाट क्षमता वाली इस परियोजना के दायरे में उत्तराखंड के नौ और हिमाचल प्रदेश के आठ गांव आएंगे। इस परियोजना से सालाना 1379 मिलियन यूनिट बिजली पैदा होगी, लेकिन इसकी कीमत के रूप में करीब छह हजार लोगों को अपना गांव छोड़ना होगा।

मंगलवार को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और हिमाचल के मुख्यमंत्री सुक्खू के बीच मुलाकात होगी, जिसमें किशाऊ बांध परियोजना पर चर्चा होनी है। इस बैठक में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री धामी भी मौजूद रहेंगे।

85 साल पुराना अधूरा सपना

यह सपना करीब 85 साल पहले देखा गया था, मगर आज भी अधूरा है। दोनों राज्यों और केंद्र सरकार की ओर से इसे पूरा करने के लिए कई बार पहल हुई, फिर भी परियोजना अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी। यह बांध एशिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध होगा। पहले स्थान पर 260 मीटर ऊंचा टिहरी डैम है।

कब और कैसे हुई शुरुआत

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर और उत्तराखंड के देहरादून जिले की सीमा पर साल 1940 में पहली बार इस परियोजना का विचार सामने आया था। पंजाब सरकार ने 1944-45 में प्रोजेक्ट साइट पर सर्वे शुरू किया, लेकिन साल 1946 में कई कारणों के चलते सरकार ने सर्वे रोक दिया। इसके बाद करीब 16 साल तक यह सर्वे ठंडे बस्ते में पड़ा रहा।

उत्तर प्रदेश सरकार ने 1962 में दोबारा सर्वे शुरू किया और 1965 में परियोजना की शुरुआती रिपोर्ट तैयार की गई। इस रिपोर्ट में बांध की ऊंचाई 235 मीटर रखने की बात कही गई। सरकार ने यह रिपोर्ट केंद्र को सौंपी और 1965 में इस परियोजना को पंचवर्षीय योजना में शामिल किया गया।

जब आयोग ने साइट को खारिज किया

डीपीआर का अवलोकन करने के बाद जल आयोग ने पाया कि किशाऊ गांव के पास परियोजना में गड़बड़ी है और सुझाव दिया कि रॉकफिल डैम की जगह आर्क डैम बनाया जाए। उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग की ओर से 1970 में फिर से सर्वे शुरू हुआ। 1978 में डीपीआर बनाई गई और रॉकफिल डैम का प्रस्ताव केंद्रीय जल आयोग को सौंपा गया।

हालांकि आयोग ने डीपीआर देखने के बाद माना कि रॉकफिल डैम के लिए यह साइट उपयुक्त नहीं है, क्योंकि यहां भौगोलिक दिक्कतें हैं। आयोग ने किशाऊ गांव के पास की साइट को खारिज कर दिया और अटाल, संभरखेड़ा तथा मोराड़ के पास साइट चुनने को कहा। बाद में संभरखेड़ा की साइट को 236 मीटर ऊंचा बांध बनाने के लिए उपयुक्त पाया गया।

परियोजना से जुड़ी जानकारी के अनुसार, संभरखेड़ा स्थान के लिए 1988 में डीपीआर बनाई गई, जिसे 1998 में उत्तर प्रदेश सरकार ने रिवाइज कर केंद्रीय जल आयोग को सौंपा। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद अब इस परियोजना की देखरेख हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सरकार कर रही है। इसी सिलसिले में 2017 में किशाऊ बांध कॉर्पोरेशन लिमिटेड नाम से कंपनी बनाई गई। फिलहाल परियोजना की साइट को लेकर अब भी मंथन जारी है।

किस नदी पर और किसे होगा फायदा

किशाऊ बांध परियोजना टौंस नदी पर प्रस्तावित है, जिससे 660 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। इसके बनने से दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को फायदा पहुंचेगा।

कितनी आएगी लागत

इस परियोजना पर करीब 11500 करोड़ रुपये की लागत आएगी, हालांकि इसमें कई अतिरिक्त खर्चे भी शामिल होंगे। साल 2018 में केंद्रीय जल आयोग ने इसकी लागत 11500 करोड़ रुपये आंकी थी। यह बांध करीब 236 मीटर ऊंचा प्रस्तावित है।

क्या होंगे फायदे

किशाऊ बांध परियोजना से 97076 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था होगी। इसके साथ ही पीने के लिए 617 MCM पानी उपलब्ध होगा। इस परियोजना में उत्तराखंड की 1452 हेक्टेयर और हिमाचल प्रदेश की 1498 हेक्टेयर जमीन इस्तेमाल होगी।

परियोजना के चलते उत्तराखंड के नौ और हिमाचल के आठ गांव पानी में डूब जाएंगे और दोनों राज्यों के कुल 5484 लोग प्रभावित होंगे।

कब तक बनेगा बांध

इस परियोजना के लिए फिलहाल 8.10 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं और काम शुरू होने के बाद इसे 96 महीने में पूरा करने की समयसीमा तय है। जून 2015 में हिमाचल और उत्तराखंड सरकार के बीच अनुबंध हुआ था। इस परियोजना में करीब 32 किमी लंबी झील बनेगी। हालांकि स्थानीय लोग इस परियोजना का विरोध भी कर रहे हैं।

हिमाचल की आपत्ति और लंबित दर्जा

फरवरी 2026 में हिमाचल सरकार ने इस परियोजना में आगे बढ़ने से इनकार कर दिया था। मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा था कि हिमाचल प्रदेश को भाखड़ा बांध का लंबित एरियर नहीं मिला है, इसलिए वह इस परियोजना में आगे नहीं बढ़ेंगे। उल्लेखनीय है कि 2008 में इस परियोजना को नेशनल प्रोजेक्ट का दर्जा दिया गया था, लेकिन यह आज भी लंबित है।

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