उत्तर प्रदेश में रजिस्ट्री कार्यालयों में लागू की जा रही ई-पंजीकरण प्रणाली के खिलाफ अधिवक्ताओं का गुस्सा सड़कों पर दिख रहा है। इस व्यवस्था के विरोध में प्रदेश भर के हजारों अधिवक्ता धरने पर बैठ गए हैं, जिससे रजिस्ट्री से जुड़े कामकाज पर बुरा असर पड़ा है। मथुरा के रजिस्ट्री कार्यालयों में इन दिनों कामकाज पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है।
नौवें दिन भी जारी रहा अनिश्चितकालीन धरना
रजिस्ट्री कार्यालय में काम करने वाले अधिवक्ताओं का अनिश्चितकालीन धरना आज करीब नौवें दिन में पहुंच गया है। पूरे उत्तर प्रदेश के साथ-साथ मथुरा में भी करीब 500 ऐसे अधिवक्ता और उनके सहयोगी धरने पर बैठे हैं, जिनकी रोजी-रोटी पर गहरा संकट मंडरा रहा है।
धरने पर बैठे अधिवक्ताओं और उनके सहयोगियों को करीब 25 लाख रुपए प्रतिदिन का नुकसान उठाना पड़ रहा है, वहीं सरकार को भी इससे करीब 3 करोड़ रुपए का घाटा झेलना पड़ रहा है।
रजिस्ट्री से होती थी रोजाना की कमाई
अब तक रजिस्ट्री के काम के सहारे एक अधिवक्ता रोजाना करीब दो से पांच हजार रुपए तक कमा लेता था। लेकिन हड़ताल पर जाने के बाद इन अधिवक्ताओं की आमदनी पूरी तरह बंद हो गई है। दर्जनों अधिवक्ता इस समय हड़ताल पर हैं, जिसके चलते मथुरा के रजिस्ट्री कार्यालयों में सारा कामकाज रुका हुआ है।
सरकार लागू कर रही 'ई-पंजीकरण' व्यवस्था
ई-पंजीकरण प्रणाली के विरोध में प्रदेश भर के अधिवक्ता और दस्तावेज लेखक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार जिस ‘ई-पंजीकरण’ व्यवस्था को लागू कर रही है, वह दरअसल विभागों के निजीकरण की दिशा में उठाया गया कदम है। उनका कहना है कि इस नई व्यवस्था के लागू होने से न सिर्फ उनकी आजीविका खतरे में पड़ जाएगी, बल्कि हजारों लोग बेरोजगार भी हो जाएंगे।
अधिवक्ता सोहन लाल शर्मा ने साफ कहा कि यह व्यवस्था उनके रोजगार पर सीधा प्रहार है। दूसरी ओर शासन का तर्क है कि ‘उत्तर प्रदेश ऑनलाइन दस्तावेज पंजीकरण नियमावली 2024’ के तहत ‘प्रेरणा सॉफ्टवेयर’ के जरिए इस प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और आम लोगों के लिए सुलभ बनाने के मकसद से यह कदम उठाया गया है। ई-पंजीकरण के माध्यम से बॉयोमेट्रिक, डिजिटल पहचान और ऑनलाइन भुगतान की सुविधा दी जा रही है।
'भूखे मरने की कगार पर पहुंच जाएंगे'
अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे अधिवक्ताओं ने बातचीत में अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा कि सरकार पूरी तरह निजीकरण के पक्ष में खड़ी है। उनका आरोप है कि ऐसे लोगों को यहां लाकर बैठाने की तैयारी की जा रही है, जिन्हें कागजी लेखन का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है।
एडवोकेट केके चौधरी और रविंद्र तिवारी ने भी अपनी बात रखते हुए कहा कि अगर इस तरह निजीकरण हुआ तो वे भूखे मरने की कगार पर पहुंच जाएंगे। उन्होंने बताया कि रजिस्ट्री कार्यालय से सिर्फ अधिवक्ता ही नहीं, बल्कि उनके मुंशी और आसपास की दुकानों में काम करने वाले दुकानदार व कर्मचारी भी जुड़े हैं, जिनकी रोजी-रोटी पर संकट आ जाएगा।
रजिस्ट्री कार्यालय से हजारों लोगों का जीवन-यापन चलता है। अगर निजीकरण हुआ तो ये लोग मनमानी करेंगे और इससे भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलेगा।
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