ओबीसी आरक्षण: जबलपुर हाईकोर्ट की नई डिवीजन बेंच आज करेगी सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने 90 दिन में फैसले का निर्देश

मध्य प्रदेश के 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण मामले में जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस भगवती प्रसाद शर्मा की नई डिवीजन बेंच आज मंगलवार दोपहर 2:30 बजे से सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने जबलपुर हाईकोर्ट को 90 दिनों के भीतर निर्णय सुनाने को कहा है।

मध्य प्रदेश के बहुचर्चित ओबीसी आरक्षण मामले में आज मंगलवार को जबलपुर हाईकोर्ट में सुनवाई होने जा रही है। राज्य में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण से जुड़ा यह मामला फिलहाल हाईकोर्ट में विचाराधीन है और इसकी सुनवाई अब एक नई डिवीजन बेंच के समक्ष होगी।

नई बेंच और सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

ओबीसी आरक्षण से जुड़े प्रकरणों की सुनवाई जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस भगवती प्रसाद शर्मा की बेंच करेगी। आज दोपहर 2:30 बजे से सुनवाई शुरू होगी। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने जबलपुर हाईकोर्ट को इस मामले में 90 दिनों के भीतर फैसला सुनाने का निर्देश दिया है।

आरक्षण का गणित और लंबित याचिकाएं

प्रदेश में कुल 73 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू है, जिसमें ओबीसी वर्ग के लिए 27 फीसदी का प्रावधान रखा गया है। राज्य सरकार 27 फीसदी आरक्षण के तहत नियुक्तियां तो कर रही है, लेकिन इसमें से 13 फीसदी पदों को होल्ड पर रखा गया है। इसी फैसले के खिलाफ अदालत में 86 याचिकाएं लंबित हैं।

दो विशेष अधिवक्ताओं की विदाई

पिछले महीने इस कानूनी लड़ाई के दौरान एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला था। सरकार ने इस केस में नियुक्त अपने दो वकीलों को पद से हटा दिया था। राज्यपाल द्वारा नियुक्त विशेष अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर और एडवोकेट विनायक प्रसाद शाह को इस जिम्मेदारी से अलग कर दिया गया था। सरकार ने इन्हें विशेष अधिवक्ता पद से हटाने की अधिसूचना भी जारी कर दी थी।

सरकार के इस कदम के बाद ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामले की कानूनी रणनीति पर कई सवाल खड़े हो गए थे। हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच विशेष अधिवक्ताओं को हटाने के निर्णय को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा भी तेज हो गई थी।

राजनीति और भर्तियों दोनों के लिए अहम

ओबीसी आरक्षण का यह मुद्दा मध्य प्रदेश की राजनीति और सरकारी भर्तियों, दोनों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। वकील दिव्यवीर सिंह के अनुसार जबलपुर हाईकोर्ट में सुनवाई फिर से शुरू हो चुकी है।

बिल का विरोध कर रहे पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट अमर लेखी ने अपने तर्क में कहा कि 50 फीसदी की सीमा को तोड़ा नहीं जा सकता। उन्होंने महाजन कमीशन पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसमें विशेषज्ञ शामिल नहीं थे, बल्कि राजनीतिक लोग और वकील थे, और उनके तर्क मुख्यतः इसी आधार पर टिके रहे। अदालत ने अगली तारीख 16 जून तय की थी। जब सभी पक्ष ऑनलाइन पेश हो रहे हैं तो आगे की तारीख लेने का कोई औचित्य नहीं है और कोर्ट ने इस दलील का संज्ञान भी लिया है।

क्या है पूरा ओबीसी आरक्षण मामला?

मध्य प्रदेश में पहले ओबीसी वर्ग के लिए 14 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था थी। बाद में कमलनाथ सरकार ने साल 2019 में इस आरक्षण को बढ़ाकर 27 फीसदी तक करने का फैसला किया। इसके बाद इस मुद्दे पर जमकर विवाद हुआ, क्योंकि 27 प्रतिशत आरक्षण के बाद एससी, एसटी और ओबीसी को मिलाकर कुल आरक्षण 50 फीसदी से ऊपर यानी करीब 63 प्रतिशत तक पहुंच गया था।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह तय कर चुका है कि आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। सरकार के इस फैसले को जबलपुर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिसके बाद अदालत ने फैसले पर रोक लगा दी थी। तभी से इस बात पर सुनवाई जारी है कि 27 फीसदी आरक्षण दिया जाना चाहिए या नहीं।

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