उत्तर प्रदेश का महराजगंज जिला अपनी भौगोलिक पहचान के साथ-साथ अपनी ऐतिहासिक मान्यताओं और महत्व के लिए भी जाना जाता है। बौद्ध परंपरा से जुड़े लोग इसे बुद्ध की धरती कहते हैं और इसका नाता बौद्ध कालीन इतिहास से जोड़कर देखते हैं। जिले के अलग-अलग हिस्सों में अनेक धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं। ऐसा ही एक क्षेत्र जिले के चौक में है, जिसे बौद्ध कालीन इतिहास का साक्षी माना जाता है।
महराजगंज जिले के देवदह में भगवान गौतम बुद्ध का ननिहाल बताया जाता है और उनके बचपन का बड़ा हिस्सा यहीं बीता था। बुद्ध के वैराग्य धारण को लेकर कई तरह की बातें कही जाती हैं, लेकिन उनके संन्यास से जुड़ा एक किस्सा सीधे महराजगंज के उस समय के इतिहास की ओर इशारा करता है। यह कहानी आपको प्रचलित विवरणों से बिल्कुल अलग लग सकती है, क्योंकि इतिहास की कई किताबों में उनके वैराग्य को लेकर भिन्न-भिन्न प्रसंग दर्ज हैं।
चौक और लक्ष्मीपुर में बिखरे ऐतिहासिक चिह्न
महराजगंज जिले के चौक क्षेत्र और लक्ष्मीपुर क्षेत्र में गौतम बुद्ध से जुड़े कई ऐतिहासिक स्थल आज भी मौजूद हैं, जो उस दौर के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
रोहिणी नदी के जलमार्ग को लेकर गहराया था टकराव
महराजगंज जिले के निचलौल स्थित राजेंद्र प्रसाद ताराचंद महाविद्यालय में इतिहास के प्रवक्ता डॉ. बृजेश पांडेय बताते हैं कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपनी पुस्तक “लॉर्ड बुद्धा” में बुद्ध के वैराग्य धारण का एक अलग प्रसंग बताया है। उनके अनुसार रोहिणी नदी के पूर्व में कोलियों का शासन था और पश्चिम में शाक्यों का, तथा ये सभी गणराज्य कोशल राजतंत्र के अधीन आते थे।
रोहिणी नदी के जल को लेकर शाक्यों और कोलियों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। शाक्य गणराज्य चाहता था कि नदी के जलमार्ग को अपनी ओर मोड़ लिया जाए ताकि उनके कृषि क्षेत्र को लाभ मिले, जबकि कोलिय गणराज्य भी इसी जलमार्ग को अपनी दिशा में मोड़ना चाहता था।
युद्ध के प्रस्ताव के विरोध में बुद्ध का मत
इस जल विवाद के चलते शाक्य गणराज्य की सभा में कोलियों के विरुद्ध युद्ध को लेकर एक बैठक बुलाई गई। जब इस सभा में युद्ध के निर्णय पर मतदान हुआ तो गौतम बुद्ध ने इसके विरोध में अपना मत दिया। विरोध में मत देने के कारण उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया और उन्हें देश निकाला दे दिया गया। जब इस घटना की जानकारी कोशल राजतंत्र तक पहुंची तो उसने इसे अपने अधिकारों का उल्लंघन माना।
इसी मोड़ ने बुद्ध को संन्यास की ओर बढ़ाया
डॉ. बृजेश पांडेय बताते हैं कि इस घटनाक्रम की जानकारी मिलने पर कोशल गणराज्य ने सवाल उठाया कि उसके आदेश के बिना शाक्य गणराज्य युद्ध का निर्णय कैसे ले सकता है। इससे यह आशंका गहरा गई कि कोशल गणराज्य कहीं शाक्यों पर आक्रमण न कर दे। इस स्थिति को देखते हुए बुद्ध ने सोचा कि इन सबसे बेहतर यही है कि सभा की गरिमा बनी रहे और उसके निर्णय का सम्मान करते हुए वैराग्य धारण कर लिया जाए।
जब वे वैराग्य धारण करने के लिए अपने वस्त्र त्याग रहे थे, तभी कोलिय और शाक्य दोनों पक्ष वहां पहुंच गए और बोले कि आप देश लौट चलें, अन्यथा संभव है कि कोशल गणराज्य हम दोनों पर आक्रमण कर दे। फिर भी बुद्ध को लगा कि यदि उनके संन्यास लेने से इतनी बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है, तो शायद प्रकृति ने उन्हें किसी और बड़े कार्य के लिए ही गढ़ा है। इसके बाद उन्होंने अपने संन्यास के निर्णय को और दृढ़ कर लिया और वैराग्य के मार्ग पर आगे बढ़ गए।
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