तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों द्वारा 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया' (एनसीपीआई) में अपने विलय का ऐलान किए जाने के ठीक एक दिन बाद इसी पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने इस पूरे फैसले पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनका कहना है कि इस अहम कदम को लेकर पार्टी नेतृत्व से कभी कोई राय-मशविरा नहीं किया गया और इस तरह का फैसला एकतरफा ढंग से नहीं लिया जा सकता।
नेतृत्व ने नहीं की कोई चर्चा
एनसीपीआई के राष्ट्रीय सचिव शांतनु डे ने दावा किया कि पार्टी अध्यक्ष ने अन्य पदाधिकारियों के साथ विलय के किसी भी प्रस्ताव पर बातचीत नहीं की थी। एक एक्सक्लूसिव बातचीत में उन्होंने कहा, 'हमें अंधेरे में रखा गया… लेकिन एनडीए में शामिल होने में कोई गुरेज नहीं है। टीएमसी के बागी सांसदों के जुड़ने से पहले न तो हमसे और न ही पार्टी के किसी सदस्य से संपर्क किया गया। हमें तो मीडिया के जरिए ही पता चला कि टीएमसी के बागी सांसद हमारी पार्टी से जुड़ना चाहते हैं।'
'पहले बैठक होनी चाहिए थी'
शांतनु डे ने आगे कहा कि 14 जून को स्पीकर के साथ बागी सांसदों की बैठक के बाद भी लोकसभा की ओर से किसी ने उनसे संपर्क नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर बागी सांसद पार्टी से जुड़ना चाहते हैं तो पहले उन्हें उनकी पार्टी के साथ बैठक करनी होगी।
एनसीपीआई को एनडीए का हिस्सा बनने में कोई दिक्कत नहीं होगी। मैं दिल से पीएम मोदी का आभारी हूं और हम उन्हें पसंद भी करते हैं। सुवेंदु अधिकारी को भी पसंद करते हैं और बीजेपी के नेताओं से हमारे अच्छे संबंध हैं।
संगठन के भीतर मतभेद की झलक
शांतनु डे का यह बयान संगठन के भीतर पनप रहे संभावित मतभेदों की ओर इशारा करता है, जो इस नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम के बाद सामने आए हैं। गौरतलब है कि उनका यह बयान टीएमसी के 20 बागी सांसदों द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात के एक दिन बाद आया, जिसमें इन सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन देने के साथ-साथ एनसीपीआई में अपने विलय की घोषणा की थी।
अचानक राष्ट्रीय सुर्खियों में आई गुमनाम पार्टी
इस पूरे घटनाक्रम ने अब तक गुमनाम रही इस पार्टी को अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। शांतनु डे ने यह भी बताया कि उनकी पार्टी की राजनीतिक सरगर्मियां मुख्य रूप से त्रिपुरा तक ही सीमित रही हैं और पश्चिम बंगाल में पार्टी कभी सक्रिय नहीं रही। उन्होंने कहा, 'भले ही इस पार्टी का पंजीकरण 2023 में पश्चिम बंगाल में हुआ था, लेकिन यह राज्य कभी भी हमारे प्रमुख कार्यक्षेत्रों में शामिल नहीं रहा।'
सीधे भाजपा में जाने के बजाय चुना गया रास्ता
तृणमूल के बागी सांसदों ने सीधे भाजपा में शामिल होने के बजाय इस अपेक्षाकृत कम चर्चित पार्टी का विकल्प चुना। राजनीतिक विश्लेषक इस कदम को एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देख रहे हैं, जिसका मकसद भाजपा के साथ औपचारिक विलय की राजनीतिक उलझनों से बचते हुए संसद में एक अलग गुट के रूप में मान्यता हासिल करना है।
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