आज जो विशाल रेगिस्तान दिखाई देता है, वह कुछ दशक पहले तक पानी से भरा एक भरा-पूरा जलाशय था। यहाँ जहाज तैरा करते थे और किनारों पर खुशहाली बसती थी। यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं, बल्कि महज तीस साल पहले की हकीकत है। जिस पानी का इस्तेमाल खेती के लिए होने लगा, वही धीरे-धीरे एक पूरे समुद्र को रेत के मैदान में बदल गया।
कभी था दुनिया का चौथा सबसे बड़ा अंदरूनी समुद्र
अरल सागर को कभी दुनिया का चौथा सबसे बड़ा इन-लैंड समुद्र होने का गौरव हासिल था। दूर पहाड़ों से निकलने वाली दो शक्तिशाली नदियाँ — सिर दरिया और आमू दरिया — काइज़िलकुम रेगिस्तान को चीरती हुई आती थीं और इस विशाल बेसिन को पानी से लबालब भर देती थीं। इन्हीं नदियों की बदौलत यह झील हमेशा भरी रहती थी। यहाँ मछली पकड़ने का बड़ा उद्योग फलता-फूलता था और आसपास के लोग समृद्ध जीवन जीते थे।
एक योजना ने बदल दी तस्वीर
1960 के दशक में सोवियत संघ ने रेगिस्तानी इलाकों में खेती बढ़ाने की योजना बनाई। इसके लिए अरल सागर को पानी देने वाली सिर दरिया और आमू दरिया का रुख मोड़ दिया गया। इस पानी से कपास और दूसरी फसलों की खेती शुरू हुई। योजना से खेती तो बढ़ी, लेकिन सागर तक पहुँचने वाला पानी घटता चला गया और झील धीरे-धीरे सूखने लगी।
सिकुड़ता गया विशाल जलाशय
पानी लगातार कम होने से अरल सागर सिमटता गया। साल 2000 तक यह अपने मूल आकार का बहुत छोटा हिस्सा भर रह गया। बाद में यह दो भागों — उत्तरी अरल सागर और दक्षिणी अरल सागर — में बँट गया। साल 2001 में दक्षिणी हिस्सा भी दो टुकड़ों में टूट गया, जिससे यह और भी छोटा हो गया।
2005 से 2009 के बीच इस इलाके में भीषण सूखा पड़ा, जिसके चलते आमू दरिया का पानी भी झील तक नहीं पहुँच पाया। आखिरकार 2014 में दक्षिणी अरल सागर का पूर्वी हिस्सा पूरी तरह सूख गया। जहाँ कभी पानी और नावें थीं, वहाँ अब सिर्फ रेगिस्तान बाकी रह गया।
तबाही का सिलसिला
सागर के सूखने से मछली उद्योग ठप हो गया और हजारों लोगों का रोजगार छिन गया। झील का सूखा तल रसायनों और कीटनाशकों से भरा हुआ था। वहाँ से उठने वाली जहरीली धूल हवा के जरिए दूर-दूर तक फैलने लगी, जिससे खेत खराब होने लगे और लोग कई बीमारियों की चपेट में आ गए। इसके साथ ही इलाके का मौसम भी बदल गया — सर्दियाँ ज्यादा ठंडी और गर्मियाँ ज्यादा गर्म होने लगीं।
बचाव की एक कोशिश और लौटती उम्मीद
हालात बिगड़ने के बाद कजाकिस्तान ने उत्तरी अरल सागर को बचाने की कोशिश की। साल 2005 में उसने 'कोक-अरल बांध' बनाया, जिससे उत्तरी हिस्से का पानी सहेजा जा सका। इसका असर यह हुआ कि उत्तरी अरल सागर में पानी का स्तर कुछ बढ़ा और वहाँ मछलियाँ तथा पक्षी फिर लौटने लगे।
अरल सागर की यह कहानी पूरी दुनिया के सामने एक बड़ा सबक रखती है कि प्राकृतिक संसाधनों का गलत इस्तेमाल कितना विनाशकारी साबित हो सकता है।
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