बिलासपुर जिले में खेती के बदलते तौर-तरीकों के बीच हल्दी की खेती किसानों के लिए आमदनी बढ़ाने का नया रास्ता बनकर उभर रही है। उत्पादन लागत में लगातार बढ़ोतरी, मौसम की अनिश्चितता और पारंपरिक फसलों से सीमित मुनाफे के चलते अब किसान ऐसी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जो कम खर्च में बेहतर कमाई दे सकें। इस कसौटी पर हल्दी एक भरोसेमंद विकल्प साबित हो रही है।
मसाले से लेकर दवा तक बढ़ती मांग
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से संबद्ध ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर कृषि महाविद्यालय, बिलासपुर के हॉर्टिकल्चर विभाग प्रमुख डॉ. संजय वर्मा के मुताबिक हल्दी एक बहुउपयोगी फसल है, जिसकी मांग मसाला उद्योग, आयुर्वेदिक दवाइयों, सौंदर्य प्रसाधनों और फूड प्रोसेसिंग क्षेत्र में निरंतर बढ़ रही है। यही कारण है कि हल्दी अब धान जैसी पारंपरिक फसलों का मजबूत विकल्प बनती जा रही है और कम लागत में अधिक लाभ देने वाली फसल के रूप में अपनी पहचान बना रही है।
सरकंडा केंद्र में उन्नत किस्मों का सफल परीक्षण
क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र, सरकंडा (बिलासपुर) में हल्दी की 7 से 8 उन्नत किस्मों पर परीक्षण किया गया है। इस दौरान 4 से 5 किस्मों ने बेहतर उत्पादन और गुणवत्ता दिखाई। सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद इन किस्मों को किसानों तक पहुंचाने का काम शुरू कर दिया गया है, ताकि क्षेत्र के किसान आधुनिक और अधिक उपज देने वाली तकनीकों का फायदा उठा सकें।
किसानों को मिल रहीं ये उन्नत किस्में
कृषि वैज्ञानिक किसानों को सुलंजना, रोमा, प्रतिभा, बीएसआर-2, छत्तीसगढ़ हल्दी-1 और छत्तीसगढ़ हल्दी-2 जैसी उन्नत किस्में उपलब्ध करा रहे हैं। इनमें रोमा और सुलंजना किस्मों को औषधीय गुणों, उच्च गुणवत्ता वाले पाउडर निर्माण और बेहतर बाजार मूल्य के लिहाज से खास तौर पर उपयुक्त माना गया है।
जून में बुआई, 6 से 7 महीने में तैयार
हल्दी की खेती मुख्य रूप से जून के पहले सप्ताह में की जाती है और इसकी बुआई राइजोम यानी गांठ के जरिए होती है। आम तौर पर प्रति हेक्टेयर 20 से 25 क्विंटल बीज की जरूरत पड़ती है, हालांकि प्रो-ट्रे तकनीक अपनाकर बीज की मात्रा घटाई जा सकती है। यह फसल करीब 6 से 7 महीने में तैयार होकर उत्पादन देने लगती है।
प्रति हेक्टेयर 300 क्विंटल तक उपज संभव
डॉ. संजय वर्मा के अनुसार उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ हल्दी की खेती से प्रति हेक्टेयर 250 से 300 क्विंटल तक उत्पादन लिया जा सकता है। यह उपज क्षमता कई पारंपरिक फसलों, खासकर धान की तुलना में अधिक फायदेमंद मानी जा रही है।
कम लागत, लाखों का मुनाफा
हल्दी की खेती में प्रति हेक्टेयर करीब 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक लागत आती है। वहीं बाजार मूल्य और उत्पादन के आधार पर किसान 2.5 लाख से 3 लाख रुपये या इससे भी अधिक का शुद्ध लाभ कमा सकते हैं। यही वजह है कि यह फसल किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
धान उत्पादकों के लिए सुनहरा मौका
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि धान की खेती करने वाले किसान अपनी आय बढ़ाने के लिए हल्दी को अपनाकर बेहतर आर्थिक लाभ ले सकते हैं। कम लागत, स्थिर बाजार मांग और औषधीय महत्व के कारण हल्दी को भविष्य की लाभकारी फसल के रूप में देखा जा रहा है।
प्रशिक्षण और पौध सामग्री की तैयारी
कृषि विभाग और कृषि विश्वविद्यालय किसानों को हल्दी की वैज्ञानिक खेती का प्रशिक्षण देने तथा उन्नत पौध सामग्री उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहे हैं। इससे किसानों को आधुनिक तकनीक अपनाने और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी।
बिलासपुर में कृषि वैज्ञानिकों की रिसर्च, उन्नत किस्मों की उपलब्धता और बाजार में लगातार बढ़ती मांग ने हल्दी की खेती को किसानों के लिए आय का मजबूत स्रोत बना दिया है। आने वाले वर्षों में यह फसल क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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