आज के दौर में रसोई के बर्तन साफ करना बेहद आसान हो गया है। बाजार में लोहे और फोम के स्क्रबर से लेकर कई कंपनियों के साबुन और लिक्विड डिटर्जेंट तक, हर तरह के उत्पाद आसानी से मिल जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब ये चीजें गांव-गांव तक नहीं पहुंची थीं, तब बर्तन किस तरह चमकाए जाते थे?
उस समय अधिकतर घरों में गैस चूल्हे की सुविधा नहीं थी। लोग मिट्टी के कच्चे चूल्हे पर लकड़ियां जलाकर खाना पकाते थे, जिससे बर्तन कई बार जल जाते और उन पर कालिख जम जाती थी। ऐसे में गांव की महिलाएं इस कालेपन को हटाने के लिए कई घरेलू नुस्खे अपनाती थीं।
धान की पराली बनती थी स्क्रबर
ग्रामीण महिला ललिता देवी बताती हैं कि पहले बर्तन मांजने के लिए न साबुन उपलब्ध होता था और न ही डिटर्जेंट। ऐसे में जले हुए बर्तनों को साफ करने के लिए धान की पराली काम आती थी। वे बताती हैं कि दो-तीन पराली लेकर उन्हें तीन-चार बार मोड़ लिया जाता था, ताकि वह हाथों में अच्छी तरह पकड़ में आ जाए।
इसके बाद इसी पराली को बर्तन पर रगड़कर अच्छी तरह मांजा जाता था, जिससे बर्तन का कालापन हट जाता था। दरअसल, धान की पराली स्क्रबर की तरह काम करती थी।
चूल्हे की राख का कमाल
बर्तन साफ करने में पराली के साथ-साथ चूल्हे की राख का भी खूब इस्तेमाल होता था। यह राख चूल्हे में लकड़ियां जलने के बाद निकलती थी और इसमें छोटे-छोटे कंकड़ जैसे कण मौजूद होते थे। यही कण बर्तन को रगड़कर बेहतरीन तरीके से चमका देते थे। यानी पराली स्क्रबर का और चूल्हे की राख डिटर्जेंट का काम करती थी।
नारियल के छिलके से भी होती थी सफाई
ललिता देवी आगे बताती हैं कि नारियल के छिलके का इस्तेमाल भी कई तरह से किया जाता था। पहले इसी छिलके से बर्तन साफ किए जाते थे। चूंकि खाना चूल्हे पर पकता था, इसलिए नारियल का छिलका जले हुए बर्तनों को बखूबी साफ कर देता था।
ये कुछ ऐसे देसी तरीके थे, जो उस दौर में गांव की महिलाओं के लिए बर्तन मांजने का काम बेहद आसान बना देते थे।
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