बिहार के छपरा जिले के किसान अब सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रह गए हैं। खेती-किसानी के साथ-साथ बकरी पालन, मुर्गी पालन, गाय पालन और मधुमक्खी पालन जैसे कामों से वे अच्छी आमदनी कमा रहे हैं। खास बात यह है कि कई किसान अब दूसरे देशों और राज्यों की नस्लों को अपनाकर मुनाफा बढ़ा रहे हैं।
ऐसे ही एक किसान हैं मांझी प्रखंड के माली पट्टी निवासी मोहम्मद आसिब, जो विदेशी नस्ल के खस्सी (बकरे) का पालन कर रहे हैं। इस नस्ल के एक किलो मीट को बेचकर एक लोकल नस्ल का पूरा खस्सी खरीदा जा सकता है। आसिब कई वर्षों से इस नस्ल को पालकर कमाई कर रहे हैं।
क्यों इतना महंगा बिकता है इसका मीट
अफ्रीकन वैरायटी के इस बकरे का मीट ज्यादातर चार स्टार और फाइव स्टार होटलों में ही मिलता है। यहां यह आसानी से चार से ₹5000 किलो तक बिक जाता है। इस मीट में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है, यही वजह है कि इसके एक किलो के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। इस खस्सी का वजन भी एक क्विंटल से ज्यादा होता है। अगर किसान कमाई के नजरिए से इसका पालन करें तो अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं, और इसे पालने में बहुत ज्यादा मेहनत भी नहीं लगती।
100 किलो से कम नहीं रहता वजन
आसिब के यहां अफ्रीकन नस्ल के इस खस्सी का वजन एक क्विंटल 62 किलो तक पहुंच चुका है। इससे पहले भी वे इस नस्ल को पालकर बेच चुके हैं। खाने के लिए हरा चारा, भूसा और दाना दिया जाता है और इतने में ही खस्सी आसानी से बढ़ता जाता है तथा एक क्विंटल से ज्यादा वजन का हो जाता है। यानी एक अफ्रीकन खस्सी पालकर किसान 1 लाख रुपये से अधिक की कमाई कर सकते हैं।
आसिब ने बताया कि वे दो नस्ल के खस्सी पालते हैं — एक अफ्रीकन बोरगोट और दूसरा तोता पड़ी नस्ल, जो आसानी से मिल जाती है। उन्होंने बताया कि शौक के तौर पर उन्होंने 3-4 की संख्या में खस्सी पाले हुए हैं। फिलहाल उनके पास अफ्रीकन बोरगोट का एक 10 महीने का खस्सी है, जिसका वजन 60 किलो से अधिक है। इस नस्ल का वजन डेढ़ क्विंटल से भी ज्यादा हो जाता है।
उन्होंने यह भी बताया कि शौक से पालने की वजह से विदेशी नस्ल के खस्सी पालने का अच्छा अनुभव हो गया है, और अब वे व्यवसाय के मकसद से इस नस्ल को पालना चाहते हैं, क्योंकि इसका मीट काफी ऊंची कीमत पर बिकता है।
छत्तीसगढ़ से लाए हैं बकरा
आसिब के मुताबिक चारे में हरा चारा, भूसा और दाना लोकल खस्सी की तरह ही दिया जाता है। इसमें अलग से कोई मेहनत नहीं है और न ही ज्यादा खर्च आता है। अगर इसे व्यवसाय के तौर पर पाला जाए तो किसान ज्यादा कमाई कर सकते हैं, क्योंकि इसका वजन लोकल नस्ल से दोगुना तक होता है।
उन्होंने बताया कि सस्ते दाम पर भी अगर इसका मीट बेचा जाए तो लोकल नस्ल की तुलना में कहीं ज्यादा कमाई हो सकती है। इसका एक किलो मीट ₹4000 से भी अधिक कीमत पर बिकता है और इसे चार स्टार या फाइव स्टार होटलों में पकाया जाता है। आसिब इस बकरे को छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से पालने के लिए लाए हैं और कई वर्षों से शौक से इस वैरायटी का खस्सी पाल रहे हैं। ऐसे में अगर किसान इस नस्ल का पालन करें तो कम खर्च में अधिक कमाई कर सकते हैं।
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