किसकी है 'असली तृणमूल' और कौन तय करेगा यह सवाल... लोकसभा अध्यक्ष या चुनाव आयोग? संवैधानिक विशेषज्ञ की साफ राय

संवैधानिक मामलों के जानकार के मुताबिक 'असली तृणमूल' का फैसला करने का अधिकार निर्वाचन आयोग के पास है, लोकसभा अध्यक्ष का इसमें कोई दखल नहीं। बागी सांसदों को फिलहाल अलग समूह की मान्यता नहीं मिली है, इसलिए सदन में अलग बैठने की व्यवस्था भी संभव नहीं।

तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए धड़े के बागी सांसद लोकसभा अध्यक्ष से अपने गुट को 'असली तृणमूल' का दर्जा दिलाने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन संवैधानिक प्रक्रियाओं के एक विशेषज्ञ ने इस प्रयास पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि इस तरह के विवाद पर निर्णय लेने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष का नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग का है।

असंतुष्ट सांसदों के एक समूह ने शुक्रवार को लोकसभा के 19 सदस्यों के समर्थन का दावा किया था। इस गुट ने ऐलान किया था कि वह सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अपने धड़े को 'असली तृणमूल' संसदीय दल के रूप में मान्यता देने की मांग रखेगा।

लोकसभा अध्यक्ष की कोई भूमिका नहीं

लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पी. डी. टी. आचारी ने रविवार को कहा कि तृणमूल कांग्रेस से जुड़े इस मौजूदा मामले में लोकसभा अध्यक्ष की कोई भूमिका नहीं बनती। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'असली तृणमूल' तय करने का अधिकार पूरी तरह निर्वाचन आयोग के दायरे में आता है।

आचारी ने सुभाष देसाई मामले का हवाला देते हुए कहा कि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने यह साफ किया था कि जब मामला दलबदल विरोधी कानून से जुड़ा हो और दो या उससे अधिक धड़े खुद को वास्तविक या असली पार्टी होने का दावा कर रहे हों, तब अध्यक्ष उस पर निर्णय ले सकता है।

आयोग के सामने रखनी होगी दलील

विशेषज्ञ के अनुसार बागी समूह को निर्वाचन आयोग के समक्ष यह साबित करना होगा कि उसके पास सबसे अधिक संख्या में सांसद और विधायक हैं और पार्टी की संगठनात्मक इकाई पर भी उसी का नियंत्रण है। उन्होंने बताया कि इसके बाद आयोग दोनों पक्षों की बात सुनेगा, मामले की जांच करेगा और ऐसा फैसला देगा जो न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर खरा उतर सके।

अभी अलग समूह नहीं माने जा सकते बागी सांसद

दलबदल विरोधी कानून और संविधान की 10वीं अनुसूची का जिक्र करते हुए आचारी ने कहा कि फिलहाल बागी सांसदों को एक अलग समूह नहीं माना जा सकता और न ही उन्हें अलग सीटें आवंटित की जा सकती हैं। इसकी वजह यह है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को लोकसभा में पहले ही सीटें दी जा चुकी हैं।

उन्होंने जोड़ा कि चूंकि बागी नेताओं को अब तक अलग मान्यता प्राप्त समूह का दर्जा नहीं मिला है, इसलिए सदन में उनके बैठने की कोई अलग व्यवस्था अभी संभव नहीं है।

तृणमूल में मची उथल-पुथल

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर अपने कई नेताओं की बगावत से तृणमूल कांग्रेस के भीतर हलचल मची हुई है। लोकसभा में पार्टी के 28 सदस्य और राज्यसभा में 13 सदस्य हैं, जिनमें से अब तक तीन इस्तीफा दे चुके हैं।

संकट में घिरी पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को शनिवार को उस वक्त एक और झटका लगा, जब उनके करीबी राजनीतिक सहयोगियों में गिने जाने वाले सुदीप बंद्योपाध्याय बागी खेमे के साथ जुड़ गए। यही खेमा अब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से संपर्क कर खुद को 'असली तृणमूल' संसदीय दल के रूप में मान्यता दिलाने की तैयारी में है।

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