बेगूसराय के शक्तिपीठ जयमंगलागढ़ से सटे कावर झील क्षेत्र में करीब 100 साल पुराने एक स्कूल को जिला प्रशासन ने पर्यटन विकास का हवाला देकर बंद कर दिया और धीरे-धीरे ढहा दिया। लगभग 6 महीने बीत जाने के बाद अब दो मासूम बच्चों की मार्मिक गुहार ने इस पूरे मामले में प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है।
एक तरफ सरकार 'सब पढ़ें, सब बढ़ें' जैसे नारों और शिक्षा के अधिकार से जुड़े बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं जमीनी सच्चाई सरकारी फाइलों में दबकर रह जाती है। कावर झील पर्यटन क्षेत्र से सामने आई इस तस्वीर ने शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हर राहगीर से एक ही अपील
यहां महज 6 साल का सोनू और 12 साल का कृष्ण कुमार पिछले 6 महीने से अपने बंद पड़े स्कूल को दोबारा खुलवाने की गुहार लगा रहे हैं। दोनों आने-जाने वाले हर व्यक्ति से सिर्फ एक ही बात कहते हैं— "मेरा स्कूल खुलवा दीजिए, मुझे पढ़ना है।"
तेज धूप में नाव पर बैठकर अपील
जब पत्रकारों की टीम कावर झील से जुड़ी कहानी कवर करने पर्यटन क्षेत्र पहुंची, तो इन दो मौसेरे भाइयों की अपील देखकर हर कोई दंग रह गया। तेज धूप में नाव पर बैठे ये दोनों बच्चे हर पर्यटक के सामने हाथ जोड़कर कह रहे थे— "मेरा स्कूल खुलवा दो।"
रिपोर्ट के अनुसार, जयमंगलागढ़ क्षेत्र में स्थित उच्च माध्यमिक विद्यालय, मंझौल-03 को करीब 6 महीने पहले बंद कर दिया गया था। स्कूल बंद होते ही यहां पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो गई। कई बच्चों ने स्कूल जाना ही छोड़ दिया, जबकि कुछ दूसरे विद्यालयों तक पहुंच पाने में असमर्थ हैं। इन्हीं में 12 साल का कृष्ण कुमार और 6 साल का सोनू भी शामिल हैं।
पर्यटकों से मदद की गुहार
कावर झील और जयमंगलागढ़ में रोजाना बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। कृष्ण कुमार और सोनू अक्सर वहां आने वाले लोगों के पास जाकर अपनी परेशानी बताते हैं। कृष्ण कहता है कि 6 महीने से स्कूल बंद है, उन्हें पढ़ना है, इसलिए कोई उसका स्कूल खुलवा दे।
इन बच्चों को उम्मीद रहती है कि शायद कोई अधिकारी, जनप्रतिनिधि या प्रभावशाली व्यक्ति उनकी बात सुन ले। इसी आस में वे हर राहगीर से अपनी पीड़ा साझा करते हैं। कई लोग उन्हें आश्वासन देकर लौट जाते हैं, लेकिन अब तक उनकी समस्या का कोई समाधान नहीं निकला।
पुलिस अधिकारी बनने का सपना
12 वर्षीय कृष्ण कुमार पुलिस अधिकारी बनना चाहता है। वह कहता है कि उसका पढ़ने में बहुत मन लगता है, लेकिन स्कूल बंद हो जाने से उसकी पढ़ाई रुक गई है। उसका कहना है कि अगर पढ़ाई पूरी हुई तो वह पुलिस बनना चाहता है। वहीं 6 साल का सोनू भी अपने बड़े भाई के साथ लोगों से मदद मांगता है और मासूमियत से कहता है कि उसका स्कूल खुलवा दिया जाए, वह भी पढ़ना चाहता है।
सिस्टम से जवाब का इंतजार
दोनों बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर सदा परिवार से ताल्लुक रखते हैं। परिवार के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वे उन्हें किसी दूर के स्कूल में नियमित रूप से भेज सकें। बताया जा रहा है कि चेरिया बरियारपुर प्रखंड प्रशासन ने सरकार के निर्देशों के नाम पर इस स्कूल को बंद कर धीरे-धीरे ढहा दिया और इसका कुछ हिस्सा अब भी बचा हुआ है।
जयमंगलागढ़ आने वाले पर्यटक जब इन बच्चों की कहानी सुनते हैं तो भावुक हो जाते हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि 6 महीने बीत जाने के बाद भी उनकी पढ़ाई दोबारा शुरू कराने के लिए कोई ठोस पहल क्यों नहीं हुई। शिक्षा को मौलिक अधिकार माना गया है, फिर भी जमीनी स्तर पर इसकी अनदेखी की जा रही है। अब देखना यह है कि इन बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने के लिए जिम्मेदार लोग क्या कदम उठाते हैं।
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