कभी ग्रामीण रसोई का अहम साथी रहा 'बिकना' आज लगभग गुम हो चुका है। यह लोहे की चादर से बना एक पारंपरिक यंत्र था, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से अनाज की सफाई में किया जाता था। पहले के समय में गांव की महिलाएं दाल में से खरपतवार और कंकड़ अलग करने के लिए इसी की मदद लेती थीं।
कैसे होता था इस्तेमाल
इसमें अरहर की दाल, उड़द की दाल और दूसरे अनाज डालकर लगभग दो से तीन मिनट तक दोनों दिशाओं में हिलाया जाता था। इस प्रक्रिया में खरपतवार बिकना में ही रुक जाता था, जबकि कंकड़ और अनाज छनकर नीचे गिर जाते थे, जिन्हें बाद में इकट्ठा कर लिया जाता था।
लोहे की चादर से बनती थी रचना
ग्रामीण महिला ललिता देवी बताती हैं कि बिकना एक तरह का पारंपरिक यंत्र होता था, जिसे महिलाएं ही इस्तेमाल करती थीं। इसे लोहे की चादर में चौड़े आकार के छेद करके तैयार किया जाता था। आज आधुनिक मशीनों ने इस यंत्र को विलुप्ति के कगार पर ला दिया है और यही वजह है कि अब यह कहीं-कहीं ही नजर आता है।
डालडा के टीन से बनाते थे कारीगर
पहले जब डालडा लोहे के टीन में आता था, तो कारीगर इसी टीन वाले डिब्बे को काटकर खास तौर पर बिकना बनाते थे। इसका आकार वर्गाकार होता था, जिसमें दो तरफ की लंबाई अधिक और दो तरफ की चौड़ाई कम रहती थी। ऊंचाई के मामले में यह ढाई से 3 इंच का होता था। लोहे की चादर से काटकर बनाया जाने वाला यह बिकना पारंपरिक वस्तुओं का एक अहम केंद्र हुआ करता था।
चलनी से कैसे अलग था बिकना
आज भी घरों में आटा छानने के लिए चलनी का इस्तेमाल होता है, लेकिन चलनी में बहुत बारीक छेद होते हैं। आकार के लिहाज से बिकना चलनी से बड़ा होता था और इसके छेद भी काफी बड़े होते थे। जहां चलनी का काम आटा छानना है, वहीं बिकना का इस्तेमाल दाल, गेहूं और दूसरे मोटे अनाज में से कंकड़ व खरपतवार साफ करने के लिए किया जाता था।
सामाजिक मेलजोल का माध्यम भी
बिकना सिर्फ एक उपकरण नहीं था, बल्कि गांव की महिलाओं के रोजमर्रा के कामों का अभिन्न हिस्सा था। सुबह-शाम महिलाएं आंगन में बैठकर अनाज साफ करती थीं और इसी दौरान आपस में बातचीत भी होती थी। यह काम घरेलू जरूरत पूरी करने के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल का जरिया भी बनता था। शादी-विवाह और दूसरे बड़े आयोजनों से पहले बड़ी मात्रा में अनाज साफ करने के लिए महिलाएं अक्सर एक साथ जुटती थीं।
हस्तनिर्मित और अपनी अलग पहचान
बिकना बनाने का काम गांव के कुशल कारीगर करते थे। वे लोहे के टीन को काटकर और बुनकर इसे तैयार करते थे। हर इलाके में इसके आकार और बनावट में थोड़ा फर्क देखने को मिलता था। कारीगर अपनी कला और अनुभव के आधार पर मजबूत व टिकाऊ बिकना बनाते थे। पूरी तरह हस्तनिर्मित होने के कारण हर बिकना अपने आप में अलग पहचान रखता था।
विलुप्ति के कगार पर
जो बिकना कभी गांव की पारंपरिक वस्तुओं में अहम भूमिका निभाता था और हर घर में मिलता था, वह आज लुप्त होने की कगार पर है। ऐसा लगता है कि अब इसे किसी संग्रहालय में संजोकर रखना चाहिए। इसके खत्म होने की वजह आधुनिक मशीनें और वैज्ञानिक उपकरण हैं, जो अनाज साफ करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
भले ही बिकना आज कम दिखाई देता हो, लेकिन इसकी यादें आज भी ग्रामीण बुजुर्गों के मन में जीवित हैं। यह उस दौर की कहानी कहता है जब लोग प्रकृति के करीब रहते थे और अपने ज्यादातर काम स्थानीय साधनों से ही करते थे। बिकना मेहनत, सादगी और स्वावलंबन का प्रतीक था, जिसकी उपयोगिता सिर्फ अनाज साफ करने तक सीमित नहीं, बल्कि यह पूरी ग्रामीण जीवनशैली का हिस्सा था।
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