कम सिंचाई वाले क्षेत्रों में सरसों की उन्नत किस्मों से करें बंपर कमाई, जानें बुआई और खाद का सही तरीका

झारखंड के पलामू जैसे कम पानी वाले इलाकों के लिए सरसों की खेती एक फायदेमंद विकल्प है। कृषि विशेषज्ञों के सुझावों के अनुसार, सही हाइब्रिड बीजों का चयन और वैज्ञानिक तरीके से बुआई करके किसान अपनी आय में बड़ा इजाफा कर सकते हैं।

कम पानी में सरसों की खेती है फायदे का सौदा

रबी सीजन के दौरान किसानों के सामने फसलों के चयन की चुनौती रहती है। झारखंड जैसे राज्य के पलामू जिले के किसान, जहां सिंचाई की सुविधाएं काफी सीमित हैं, उनके लिए सरसों की खेती गेहूं के मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर विकल्प साबित हो सकती है। सरसों की खेती में न केवल लागत कम आती है, बल्कि बाजार में तेल की निरंतर मांग के कारण मुनाफा भी अधिक मिलता है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि किसान सही हाइब्रिड किस्मों का चुनाव करें और खेती में तकनीक का सही इस्तेमाल करें, तो पैदावार को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

देश में खाद्य तेल की भारी मांग

कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, भारत में खाद्य तेल की खपत का स्तर काफी ऊंचा है। देश में हर साल लगभग 25 मिलियन टन खाद्य तेल की जरूरत पड़ती है। इस मांग के मुकाबले घरेलू उत्पादन महज 11 मिलियन टन के आसपास ही हो पाता है। बाकी बची हुई भारी-भरकम मांग को पूरा करने के लिए विदेशों से आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। इस निर्भरता को कम करने के लिए सोयाबीन और सरसों जैसी तिलहनी फसलों को बढ़ावा देना बहुत जरूरी है। पाम ऑयल के अलावा सरसों का तेल घरेलू उत्पादन बढ़ाने का एक प्रमुख जरिया हो सकता है, जिससे न केवल किसानों की जेब भरेगी, बल्कि देश के राजस्व की भी बचत होगी।

मुनाफा दिलाने वाली हाइब्रिड किस्में

बाजार में इस समय कई उन्नत हाइब्रिड प्रभेद मौजूद हैं जो बंपर उत्पादन देने के लिए जाने जाते हैं। हालांकि ये बीज सामान्य किस्मों की तुलना में थोड़े महंगे होते हैं और इनकी कीमत लगभग 1200 रुपये प्रति किलो तक हो सकती है, लेकिन इनका उत्पादन काफी अधिक होता है। प्रमुख किस्मों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • पायनियर का 45S46 और 45S42
  • श्रीराम का 106
  • एडवांटा का 414
  • क्रिस्टल का 5222

ये किस्में अपनी उच्च उत्पादन क्षमता के लिए प्रसिद्ध हैं, जिससे किसान बेहतर रिटर्न हासिल कर सकते हैं।

बीज की कम मात्रा और बुआई का गणित

हाइब्रिड सरसों की एक बड़ी खूबी यह है कि इसमें बीज की मात्रा काफी कम लगती है। प्रति एकड़ खेत में केवल 1 किलो बीज पर्याप्त होता है। यदि आप इसे हेक्टेयर के हिसाब से देखें, तो एक हेक्टेयर में लगभग ढाई किलो बीज की आवश्यकता होती है। हालांकि, बीज की यह दर बुआई के तरीके और विशेष किस्म के आधार पर थोड़ी कम या ज्यादा हो सकती है। बेहतर उत्पादन पाने के लिए पौधों के बीच की दूरी का सही प्रबंधन करना, संतुलित मात्रा में खाद का प्रयोग करना और सही समय पर सिंचाई करना बेहद जरूरी है।

बिरसा भाभा-1 भी एक शानदार विकल्प

हाइब्रिड बीजों के अलावा, कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से विकसित बिरसा भाभा-1 किस्म भी किसानों के लिए एक भरोसेमंद विकल्प है। यह किस्म कम समय में फसल तैयार करने के लिए जानी जाती है। जानकारी के अनुसार, यह फसल 115 से 120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 15 से 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आंकी गई है। किसान अपने क्षेत्र के कृषि विशेषज्ञों या कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर इस किस्म के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

बुआई का सही समय और तकनीक

सरसों की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम पानी में भी जीवित रहने की क्षमता है। इसे गेहूं की तुलना में काफी कम सिंचाई की जरूरत होती है। बस यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि मिट्टी में उचित नमी बनी रहे। बुआई के लिए अक्टूबर का महीना सबसे उपयुक्त माना जाता है। हालांकि, जो किसान सितंबर में बुआई करने की सोच रहे हैं, उन्हें अपने क्षेत्र की स्थानीय जलवायु और बीज की किस्म का विशेष ध्यान रखना चाहिए। अंत में, मिट्टी की नमी के अनुसार सही समय पर बुआई और फसल की उचित देखभाल से किसान निश्चित रूप से अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं।

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