गर्भवती पत्नी के लिए खुद ही 'स्ट्रेचर' बन गया पति, कंधे का सहारा देकर वार्ड तक पहुंचाया

दतिया जिला अस्पताल में 9 माह की गर्भवती महिला को स्ट्रेचर तक नहीं मिला, जिसके बाद पति ने खुद उसे सहारा देकर वार्ड तक पहुंचाया। मामले का वीडियो वायरल होने पर स्वास्थ्य विभाग ने जांच की बात कही है।

मध्य प्रदेश के दतिया जिला अस्पताल से सामने आई एक तस्वीर ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां इलाज के लिए पहुंची 9 माह की एक गर्भवती महिला को अस्पताल में स्ट्रेचर तक नसीब नहीं हुआ। हालत यह रही कि आखिरकार पति को ही अपनी पत्नी के लिए 'मानवीय स्ट्रेचर' बनना पड़ा और उसने कंधे का सहारा देकर उसे वार्ड तक पहुंचाया।

सहारा देने तक नहीं आया कोई कर्मचारी

गर्भवती मनीषा अहिरवार इलाज कराने के लिए अस्पताल पहुंची थीं। उनका आरोप है कि ड्रिप चढ़ाने के बाद उन्हें खुद चलकर वार्ड तक जाने को कह दिया गया। मनीषा के मुताबिक उन्होंने स्टाफ को साफ बताया कि उन्हें चक्कर आ रहे हैं और पैदल चलना मुश्किल हो रहा है, इसके बावजूद किसी भी स्वास्थ्यकर्मी ने उनकी मदद नहीं की। अस्पताल के गलियारों में उन्हें सहारा देने के लिए कोई वार्ड बॉय आगे नहीं आया।

पति की गुहार पर भी नहीं पसीजा स्टाफ

मनीषा के पति मनोज अहिरवार का कहना है कि उन्होंने अस्पताल स्टाफ से स्ट्रेचर की मांग की और बार-बार गुहार लगाई कि उनकी पत्नी चलने की स्थिति में नहीं है। आरोप है कि स्टाफ ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। कोई रास्ता न देखकर मनोज ने खुद ही अपनी पत्नी को कंधे का सहारा दिया और उसे वार्ड तक ले गए। इस पूरी घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

व्यवस्था के दावे और जमीनी हकीकत

जिला अस्पताल में प्रसूताओं और गंभीर मरीजों के लिए स्ट्रेचर और व्हीलचेयर उपलब्ध होने का दावा किया जाता है। अस्पताल के डॉ. राजेश पटेल का कहना है कि यहां पर्याप्त संख्या में स्ट्रेचर और वार्ड बॉय मौजूद हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि व्यवस्था मौजूद थी, तो वह मनीषा तक क्यों नहीं पहुंची।

CMHO ने दिया जांच का आश्वासन

मामले पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. बीके वर्मा ने कहा कि वीडियो के माध्यम से यह मामला उनके संज्ञान में आया है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि मामले की जांच कराई जाएगी और जो भी दोषी पाया जाएगा, उस पर कार्रवाई की जाएगी।

हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब दतिया जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठे हों। सरकारी दावे भले ही मातृत्व को सुरक्षित बताते हों, लेकिन जब एक गर्भवती महिला को बुनियादी सुविधा के लिए भी जूझना पड़े, तो ये दावे खोखले नजर आते हैं। अब बड़ा सवाल यही है कि जांच के बाद वाकई कार्रवाई होगी या मामला महज नोटिस तक सिमटकर रह जाएगा।

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