पर्यावरण की रक्षा का जिम्मा सिर्फ सरकारों पर छोड़ देने के बजाय जब समाज खुद आगे बढ़कर ठान ले, तो बड़े से बड़ा बदलाव संभव हो जाता है। देहरादून के युवाओं की एक छोटी सी टोली 'मेड' ने इसी बात को धरातल पर सच कर दिखाया है। बिना किसी सरकारी बजट या तामझाम के ये युवा शहर की नदियों को नया जीवन देने में जुटे हुए हैं।
छुट्टी के दिन भी नदियों के नाम समर्पण
रविवार का दिन, जब आमतौर पर युवा आराम करना या घूमना-फिरना पसंद करते हैं, इस संस्था के सदस्य सुबह-सुबह हाथों में बोरे और दस्ताने थामकर सीधे पानी में उतर जाते हैं। देहरादून की जीवनरेखा मानी जाने वाली रिस्पना, बिंदाल और तमसा जैसी नदियों को पुनर्जीवित करना ही इनका लक्ष्य है। अपने जेबखर्च से बचाई गई राशि के सहारे ये युवा यह काम कर रहे हैं।
मूक आंदोलन बना मिसाल
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर इन युवाओं का यह खामोश आंदोलन आज दून के हर नागरिक के लिए एक उदाहरण बन चुका है। ये न सिर्फ नदियों से कचरा साफ कर रहे हैं, बल्कि किनारे खड़े समाज की सोई हुई चेतना को भी जगाने का काम कर रहे हैं।
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