भारत बनाम चीन: 2026 में किसके पास है तोपखाने की असली ताकत, आंकड़ों से समझिए सैन्य संतुलन

ग्लोबल फायरपावर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत और चीन की आर्टिलरी शक्ति में स्पष्ट अंतर है। जहाँ भारत टोव्ड आर्टिलरी में दुनिया में तीसरे स्थान पर है, वहीं चीन सेल्फ-प्रोपेल्ड गन और रॉकेट सिस्टम में भारी बढ़त बनाए हुए है।

सैन्य शक्ति का आधार: आर्टिलरी का महत्व

युद्ध के मैदान में जीत सुनिश्चित करने के लिए केवल टैंकों की संख्या पर्याप्त नहीं होती, बल्कि दुश्मन की रक्षा पंक्तियों को भेदने के लिए तोपखाने यानी आर्टिलरी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। सैन्य इतिहास पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर आधुनिक संघर्षों तक, दुश्मन के ठिकानों पर दूर से गोलाबारी करने, पैदल सेना को कवर प्रदान करने और टैंकों के आगे बढ़ने का रास्ता बनाने में आर्टिलरी ने निर्णायक भूमिका निभाई है। अमेरिकी सेना के रणनीतिक दस्तावेजों में भी इसे आक्रामक अभियानों का मुख्य आधार माना गया है। वर्तमान में, ग्लोबल फायरपावर के वर्ष 2026 के आंकड़े भारत और चीन के बीच सैन्य संतुलन को समझने का एक नया नजरिया प्रदान करते हैं। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि दोनों देशों की सैन्य रणनीति में तोपखाने के प्रकार और उनके उपयोग को लेकर कितना बड़ा वैचारिक अंतर है।

आंकड़ों की तुलना: क्या कहता है 2026 का रिपोर्ट कार्ड

आर्टिलरी की ताकत को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: टोव्ड आर्टिलरी, सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी और मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम यानी MLRS। ग्लोबल फायरपावर 2026 के अनुसार इन दोनों पड़ोसी देशों की स्थिति इस प्रकार है:

  • भारत: टोव्ड आर्टिलरी की संख्या 5,640 है, जबकि सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी 100 हैं और MLRS/रॉकेट आर्टिलरी की कुल संख्या 300 है।
  • चीन: टोव्ड आर्टिलरी की संख्या 1,400 है, जबकि सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी 2,940 हैं और MLRS/रॉकेट आर्टिलरी की संख्या 2,770 है।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत टोव्ड आर्टिलरी के मामले में चीन से काफी आगे है, जबकि चीन मोबाइल और आधुनिक रॉकेट प्रणालियों में भारत की तुलना में बहुत अधिक मजबूत स्थिति में है।

टोव्ड आर्टिलरी में भारत का दबदबा

टोव्ड आर्टिलरी वे तोपें होती हैं जिन्हें किसी वाहन के जरिए खींचकर युद्ध क्षेत्र तक ले जाया जाता है। इन तोपों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें तैनात करने के लिए अलग से ट्रैक्टर या विशेष वाहनों की आवश्यकता होती है। इस श्रेणी में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है। भारत के पास 5,640 टोव्ड आर्टिलरी सिस्टम मौजूद हैं, जो चीन के 1,400 सिस्टम के मुकाबले करीब 4,240 अधिक हैं। गणितीय दृष्टि से देखें तो भारत का इस क्षेत्र में स्टॉक चीन की तुलना में लगभग चार गुना ज्यादा है। यह विशाल संख्या भारतीय सेना को एक बड़ा रणनीतिक लाभ प्रदान करती है।

सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी में चीन की भारी बढ़त

जब हम सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी यानी SP आर्टिलरी की बात करते हैं, तो तस्वीर पूरी तरह से बदल जाती है। इन प्रणालियों में तोप सीधे एक वाहन या टैंकनुमा ढांचे पर लगी होती है, जिससे इसे अलग से खींचने की जरूरत नहीं पड़ती। यह प्रणाली युद्ध के दौरान तेजी से जगह बदलने और दुश्मन पर हमला करने के लिए अत्यंत प्रभावी मानी जाती है। इस श्रेणी में चीन का पलड़ा बेहद भारी है। चीन के पास 2,940 सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी सिस्टम हैं, जिससे वह दुनिया में दूसरे स्थान पर है। इसके विपरीत, भारत के पास इस श्रेणी में केवल 100 सिस्टम हैं और भारत की वैश्विक रैंकिंग 35वीं है। चीन के पास भारत से 2,840 अधिक ऐसे सिस्टम हैं, जो संख्या के मामले में भारत से करीब 29 गुना ज्यादा हैं। यह दोनों देशों की आर्टिलरी संरचना में सबसे बड़े अंतर को दर्शाता है।

रॉकेट आर्टिलरी (MLRS) में चीन की आक्रामकता

तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण श्रेणी मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम यानी MLRS की है। इसमें एक ही लॉन्चर से बहुत कम समय में बड़ी संख्या में रॉकेट दागे जा सकते हैं। ग्लोबल फायरपावर के अनुसार चीन इस क्षेत्र में दुनिया में शीर्ष स्थान पर है। चीन के पास 2,770 MLRS सिस्टम हैं, जबकि भारत के पास 300 सिस्टम हैं और भारत 16वें स्थान पर है। इसका मतलब है कि चीन के पास भारत की तुलना में 2,470 अधिक रॉकेट सिस्टम हैं। यदि अनुपात की बात करें, तो चीन का स्टॉक भारत से 9 गुना से भी ज्यादा है।

रणनीतिक विश्लेषण: भारत की ताकत का आधार

यदि तीनों श्रेणियों के कुल योग को देखें, तो चीन के पास कुल 7,110 सिस्टम हैं, जबकि भारत के पास 6,040 सिस्टम हैं। लेकिन केवल कुल संख्या देखकर निष्कर्ष निकालना गलत होगा। भारत के पास 5,640 टोव्ड आर्टिलरी का होना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। भारतीय सेना को अपनी पश्चिमी सीमाओं के मैदानी इलाकों के साथ-साथ उत्तरी सीमा के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में भी तोपखाना तैनात करना पड़ता है। टोव्ड तोपें दुर्गम और पहाड़ी रास्तों पर अधिक विश्वसनीय और टिकाऊ सिद्ध होती हैं। बड़ी संख्या में टोव्ड आर्टिलरी होने का अर्थ है कि भारत के पास विभिन्न मोर्चों पर गोलाबारी करने की क्षमता और व्यापक तैनाती का आधार मौजूद है। यह सेना को अलग-अलग सेक्टरों में अपनी मारक क्षमता को केंद्रित करने का विकल्प देता है।

निष्कर्ष: क्या भारत और चीन का मुकाबला संतुलित है?

आंकड़ों को केवल एक नजरिए से देखना भ्रामक हो सकता है। चीन जहां सेल्फ-प्रोपेल्ड और रॉकेट आधारित प्रणालियों पर जोर देकर अपनी गतिशीलता को बढ़ा रहा है, वहीं भारत अपनी टोव्ड आर्टिलरी के जरिए एक विशाल और स्थायी अग्नि-समर्थन आधार बनाए हुए है। यह कहना सही नहीं होगा कि 5,640 बनाम 1,400 का अंतर केवल पुरानी तोपों का भंडार है; बल्कि यह व्यापक भौगोलिक क्षेत्रों में sustained fire support देने की भारतीय सेना की क्षमता को दर्शाता है। कुल मिलाकर, जहां चीन आधुनिक मोबाइल सिस्टम में बढ़त रखता है, वहीं भारत की सामरिक गहराई उसके टोव्ड आर्टिलरी के विशाल स्टॉक से आती है। आने वाले समय में सैन्य आधुनिकीकरण के साथ ही इन आंकड़ों में भी बदलाव की संभावना बनी रहेगी।

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