वर्चुअल बैठक से वैश्विक भूचाल तक: BRICS का पांच साल का ऐतिहासिक सफर
साल 2021 के सितंबर महीने की 9 तारीख को जब भारत ने 13वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी, तो उस समय दुनिया की स्थिति आज से बिल्कुल अलग थी। कोरोना महामारी की विभीषिका से जूझती हुई दुनिया उस समय वर्चुअल माध्यमों से एक-दूसरे से जुड़ रही थी। उस समय इस संगठन में केवल पांच देश शामिल थे जिन्हें हम भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के नाम से जानते थे। उस समय की वैश्विक चुनौतियां आज की तुलना में बेहद सामान्य प्रतीत होती हैं। उस दौर में वैश्विक मंच पर मुख्य रूप से अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा, अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की अचानक वापसी और वैश्विक स्तर पर कोरोना वैक्सीन के समान वितरण जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही थी। लेकिन आज, पांच साल बाद जब सितंबर 2026 में भारत एक बार फिर से इस महत्वपूर्ण वैश्विक संगठन के शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, तो दुनिया की पूरी भू-राजनीतिक तस्वीर बदल चुकी है। इन पांच वर्षों में यूरोप में एक बड़ा युद्ध छिड़ गया, पश्चिम एशिया में कई मोर्चे खुल गए, BRICS का व्यापक विस्तार हुआ, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता में वापसी हुई, दुनिया ने बड़े पैमाने पर टैरिफ वॉर यानी व्यापार युद्ध देखा और भारत-पाकिस्तान के बीच भी गंभीर सैन्य टकराव की स्थिति बनी। साल 2026 तक आते-आते ईरान का युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का संकट पूरी दुनिया की सबसे बड़ी रणनीतिक और आर्थिक चिंता बन चुका है।
2022: रूस-यूक्रेन युद्ध ने बदल दी यूरोप और दुनिया की सुरक्षा तस्वीर
24 फरवरी 2022 को रूस ने जब यूक्रेन के खिलाफ अपनी बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की, तो किसी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि यह संघर्ष आने वाले कई वर्षों तक पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा। यह युद्ध जल्द ही रूस और यूक्रेन की सीमाओं से बाहर निकलकर रूस और पश्चिमी देशों के बीच एक ऐतिहासिक टकराव में बदल गया। अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने रूस पर कड़े आर्थिक और वित्तीय प्रतिबंध लगा दिए, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई। यूरोप में गैस और कच्चे तेल की भारी किल्लत हो गई, जिसने पूरी दुनिया में महंगाई की एक नई लहर पैदा कर दी। इस संकट के कारण न केवल ईंधन बल्कि अनाज और उर्वरकों की कीमतें भी आसमान छूने लगीं, जिससे विकासशील देशों के सामने खाद्य सुरक्षा का संकट खड़ा हो गया। इस युद्ध ने शीत युद्ध के दौर के संगठन NATO की भूमिका को भी फिर से मजबूत कर दिया। अपनी सुरक्षा को मजबूत करने और सामूहिक रक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए फ़िनलैंड ने अप्रैल 2023 में और स्वीडन ने मार्च 2024 में आधिकारिक रूप से NATO की सदस्यता ग्रहण कर ली। यूरोपीय सुरक्षा का यह बदलाव इतिहास में सबसे तेजी से होने वाले बड़े बदलावों में से एक था। इसी दौरान, पूर्व एशिया में भी सुरक्षा संकट गहरा गया। अगस्त 2022 में तत्कालीन अमेरिकी हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी के ताइवान दौरे ने चीन को बेहद नाराज किया, जिसके बाद चीन ने ताइवान के चारों तरफ एक विशाल लाइव-फायर सैन्य अभ्यास किया। इसने यह स्पष्ट कर दिया कि दुनिया अब दो बड़े सुरक्षा मोर्चों पर बंट चुकी थी: यूरोप में रूस बनाम पश्चिमी देश और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका बनाम चीन।
2023: पश्चिम एशिया में भड़का युद्ध और लाल सागर संकट
साल 2023 की शुरुआत अफ्रीका के सूडान में भड़के भीषण गृहयुद्ध से हुई, जिसने वहां की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को पूरी तरह से तबाह कर दिया। लेकिन इस साल का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक झटका 7 अक्टूबर 2023 को लगा, जब हमास ने इजरायल पर एक बड़ा हमला किया। इसके जवाब में इजरायल द्वारा गाजा में शुरू की गई सैन्य कार्रवाई ने देखते ही देखते पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध की आग में झोंक दिया। गाजा का यह संघर्ष धीरे-धीरे लेबनान, सीरिया और लाल सागर तक फैल गया। यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। लाल सागर और स्वेज नहर के मार्ग से होने वाला व्यापार ठप होने के कगार पर पहुंच गया, जिससे वैश्विक जहाजों को अफ्रीका के सुदूर मार्ग (केप ऑफ गुड होप) का चक्कर लगाकर जाना पड़ा। इससे जहाजों की यात्रा का समय और माल ढुलाई की लागत कई गुना बढ़ गई। इसी संकट और उथल-पुथल के बीच, अगस्त 2023 में दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन में एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। इस समूह ने अपने दरवाजे अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए खोलने का फैसला किया, जो कि इस वैश्विक मंच के विस्तार की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम था।
2024: BRICS का ऐतिहासिक विस्तार और बड़े वैश्विक राजनीतिक बदलाव
1 जनवरी 2024 को BRICS के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हुआ जब मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात आधिकारिक तौर पर इसके पूर्णकालिक सदस्य बन गए। इस विस्तार ने न केवल इस समूह के भौगोलिक दायरे को बढ़ाया बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति और कूटनीति में भी इसके प्रभाव को दोगुना कर दिया। इस साल दुनिया के विभिन्न हिस्सों में असाधारण राजनीतिक बदलाव भी देखने को मिले। भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में छात्रों के नेतृत्व में भड़के हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद, अगस्त 2024 में लंबे समय से प्रधानमंत्री के पद पर काबिज रहीं शेख हसीना को अचानक इस्तीफा देकर भारत में शरण लेनी पड़ी। पश्चिम एशिया में इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच जमीनी और हवाई हमले तेज हो गए, जिससे लेबनान पूरी तरह से अस्थिर हो गया। वहीं, दिसंबर 2024 में सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार का अचानक पतन हो गया, जिससे पूरे मध्य-पूर्व की राजनीति में एक नया शक्ति संतुलन स्थापित होने लगा। इस बीच, नवंबर 2024 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर शानदार जीत दर्ज करते हुए अमेरिकी सत्ता में वापसी की। ट्रंप की इस वापसी ने वाशिंगटन की विदेश, व्यापार और सुरक्षा नीतियों में बड़े बदलावों का स्पष्ट संकेत दे दिया।
2025: ट्रंप का नया टैरिफ युद्ध और भारत-पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिंदूर
साल 2025 की शुरुआत के साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था कड़े आर्थिक प्रतिबंधों और नए व्यापारिक शुल्कों के जाल में उलझ गई। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी घोषित आर्थिक नीतियों के तहत 2 अप्रैल 2025 को अमेरिका में आने वाले सामानों पर एक नया और कड़ा टैरिफ ढांचा लागू कर दिया। इसके तहत अमेरिका ने अधिकांश देशों से आने वाली वस्तुओं पर कम से कम 10 प्रतिशत का बेसलाइन टैरिफ लगा दिया, जबकि चीन जैसे देशों पर इसे और अधिक बढ़ा दिया गया। इस कदम ने अमेरिका और चीन समेत दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापारिक तनाव को चरम पर पहुंचा दिया। अब दुनिया यह समझने लगी थी कि आधुनिक युग में केवल सैन्य ताकत ही नहीं, बल्कि तकनीकी पेटेंट, सेमीकंडक्टर की आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक टैरिफ भी रणनीतिक हथियार बन चुके हैं। इसी साल भारत और पाकिस्तान के बीच भी एक गंभीर सैन्य टकराव देखने को मिला। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ, जिसमें 26 लोगों की मौत हो गई। इस हमले के जवाब में भारतीय सेना ने 7 मई को 'ऑपरेशन सिंदूर' शुरू किया। भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के भीतर आतंकियों के नौ प्रमुख ठिकानों को सफलतापूर्वक निशाना बनाने की घोषणा की। इस सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों परमाणु-संपन्न देशों के बीच कई हफ्तों तक भीषण तनाव बना रहा, जो 2021 के बाद से दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी सुरक्षा घटना थी।
2025 (उत्तरार्ध): इजरायल-ईरान के बीच सीधी जंग और अमेरिकी दखल
मध्य-पूर्व का संकट 2025 के मध्य में अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। 13 जून 2025 को इजरायल ने ईरान के सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू कर दिए, जिससे दोनों देशों के बीच दशकों पुराना छद्म युद्ध (प्रॉक्सी वॉर) सीधे सैन्य टकराव में बदल गया। इस संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजारों में हाहाकार मचा दिया। हालात और तब बिगड़ गए जब 22 जून को अमेरिका भी इस युद्ध में सीधे तौर पर शामिल हो गया। अमेरिकी सेना ने ईरान के तीन अत्यंत संवेदनशील परमाणु ठिकानों - फोर्डो, नतांज और इस्फहान को निशाना बनाकर हमले किए। इस कार्रवाई से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बड़ा झटका लगा और पश्चिम एशिया में एक पूर्ण परमाणु युद्ध का खतरा विज्ञान की परिधि से बाहर मंडराने लगा। इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच, BRICS समूह अपनी ताकत और दायरे को लगातार बढ़ा रहा था। इसी वर्ष इंडोनेशिया भी BRICS का पूर्णकालिक सदस्य बन गया, जिससे समूह की सदस्य संख्या बढ़कर और मजबूत हो गई। अब इस समूह के भीतर अमेरिकी डॉलर पर वैश्विक निर्भरता को कम करने और स्थानीय मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने की चर्चाएं और नीतियां काफी तेज हो गईं, हालांकि एक साझा BRICS मुद्रा के निर्माण पर सभी सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनाना अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी।
2026: वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का महासंकट
साल 2026 की शुरुआत लैटिन अमेरिका में एक असाधारण सैन्य घटना के साथ हुई। 3 जनवरी 2026 को अमेरिकी विशेष बलों ने वेनेजुएला के भीतर एक बड़ा और गुप्त सैन्य ऑपरेशन चलाकर वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया। अमेरिका ने इस कार्रवाई को वेनेजुएला में लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहाली और सत्ता परिवर्तन के रूप में सही ठहराने की कोशिश की। चूंकि वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित कच्चा तेल भंडार है, इसलिए इस घटना ने वैश्विक ऊर्जा राजनीति और तेल की कीमतों को तत्काल प्रभावित किया। दूसरी ओर, ईरान में अमेरिका और इजरायल की लगातार सैन्य कार्रवाइयों के बाद स्थिति बेकाबू हो चुकी थी। इस युद्ध के कारण दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्ग, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से संकट में आ गया। इस संकीर्ण जलमार्ग से होकर दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा गुजरता है। यहां बढ़ते सैन्य टकराव और नाकेबंदी की आशंका के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर गईं, जिससे वैश्विक आर्थिक मंदी का खतरा बेहद वास्तविक हो गया। यही कारण है कि सितंबर 2026 का यह BRICS शिखर सम्मेलन साल 2021 के सम्मेलन से पूरी तरह अलग है। वर्तमान में ईरान स्वयं BRICS का सदस्य है और वह सीधे तौर पर अमेरिका और इजरायल के खिलाफ युद्ध में व्यस्त है, जबकि समूह का एक अन्य महत्वपूर्ण सदस्य संयुक्त अरब अमीरात भी इस युद्ध की आंच और इसके आर्थिक दुष्प्रभावों को सीधे महसूस कर रहा है।
2021 से 2026: पांच वर्षों में कैसे बदला दुनिया का पूरा नक्शा?
यदि हम पिछले पांच वर्षों में हुए इन युगांतकारी परिवर्तनों को सिलसिलेवार ढंग से समझें, तो वैश्विक परिदृश्य में आया यह बदलाव पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है:
- 2021: यह वर्ष वैश्विक महामारी कोरोना से उबरने के प्रयासों, अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ते कूटनीतिक तनाव का साक्षी रहा।
- 2022: रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए आक्रमण ने यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को हिला दिया और इसके जवाब में NATO का नया विस्तार (फ़िनलैंड और स्वीडन के प्रवेश के साथ) हुआ।
- 2023: हमास के इजरायल पर हमले के बाद गाजा युद्ध की शुरुआत हुई, सूडान गृहयुद्ध की विभीषिका में झुलसा और लाल सागर संकट ने वैश्विक समुद्री व्यापार को प्रभावित किया।
- 2024: BRICS के ऐतिहासिक विस्तार के तहत चार नए देश शामिल हुए, बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्तापलट हुआ, सीरिया में असद सरकार का पतन हुआ और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी हुई।
- 2025: राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा वैश्विक स्तर पर नए टैरिफ युद्ध की घोषणा की गई, भारत ने पहलगाम हमले के बाद 'ऑपरेशन सिंदूर' चलाया और इजरायल-ईरान के बीच सीधा युद्ध शुरू हो गया।
- 2026: वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के जरिए निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी हुई, ईरान युद्ध के चरम पर पहुंचने से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल संकट खड़ा हुआ और कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया।
नई दिल्ली शिखर सम्मेलन 2026: एक बिखरी हुई दुनिया में एकजुटता की परख
इस पृष्ठभूमि में, 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित हो रहा BRICS शिखर सम्मेलन कोई साधारण कूटनीतिक बैठक नहीं है। यह सम्मेलन उस बदली हुई और बिखरी हुई दुनिया की वास्तविक तस्वीर पेश करता है, जो पिछले पांच वर्षों में युद्ध, व्यापारिक प्रतिबंधों और सत्ता परिवर्तनों के दौर से गुजरी है। साल 2021 में जब भारत ने इसकी मेजबानी की थी, तब यह पांच विकासशील देशों का एक आर्थिक संगठन था। लेकिन आज 2026 में, 11 सदस्य देशों के साथ यह समूह दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक जीडीपी के एक विशाल हिस्से का प्रतिनिधित्व कर रहा है। अब इस समूह के सामने केवल आर्थिक विकास का एजेंडा नहीं है, बल्कि एक ऐसे समय में शांति, वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और स्वतंत्र व्यापार को बनाए रखने की गंभीर चुनौती है जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध की आग धधक रही है। नई दिल्ली में जुटने वाले राष्ट्राध्यक्षों के फैसले न केवल इस समूह का भविष्य तय करेंगे, बल्कि यह भी निर्धारित करेंगे कि आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
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