दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) में हर साल देश के कोने-कोने से लाखों छात्र बेहतर भविष्य और अच्छी पढ़ाई का सपना लेकर आते हैं। इन छात्रों के लिए दिल्ली जैसे महानगर में सबसे बड़ी चुनौती पढ़ाई से अधिक सुरक्षित और किफायती रहने का ठिकाना खोजने की होती है। हाल ही में दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक पीजी (पेइंग गेस्ट) की इमारत ढहने से एक बेहद दर्दनाक हादसा हुआ था। इस हादसे ने डीयू के हॉस्टल संकट और छात्रों की सुरक्षा के मुद्दे को एक बार फिर से देश के सामने ला दिया है। सच तो यह है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी का नया और महत्वाकांक्षी हॉस्टल विस्तार प्लान भी छात्रों की कुल जरूरत का महज 5 प्रतिशत हिस्सा ही पूरा कर पाने में सक्षम दिख रहा है।
डीयू का नया हॉस्टल प्लान: ऊंट के मुंह में जीरा
दिल्ली विश्वविद्यालय को देश का सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान माना जाता है। यहां उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा और पूर्वोत्तर राज्यों समेत देश के हर हिस्से से मेधावी छात्र पढ़ने आते हैं। इनमें से अधिकांश छात्र मध्यमवर्गीय परिवारों से ताल्लुक रखते हैं, जिनके लिए दिल्ली जैसे महानगर में रहना और निजी कमरों का खर्च उठाना बहुत मुश्किल होता है। यूनिवर्सिटी द्वारा जारी हालिया आंकड़ों के अनुसार, कैंपस में हॉस्टल सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन जब हम इन आंकड़ों की तुलना छात्रों की कुल संख्या से करते हैं, तो स्थिति बेहद चिंताजनक नजर आती है।
डीयू की ताजा वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, विश्वविद्यालय में नियमित (Regular) रूप से पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट्स की कुल संख्या 2,51,474 है। इस संख्या में स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग और डिस्टेंस एजुकेशन के छात्र शामिल नहीं हैं। इसके विपरीत, यूनिवर्सिटी के पास वर्तमान में और भविष्य में प्रस्तावित सभी सीटों को मिलाकर कुल क्षमता सिर्फ 12,754 होने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि डीयू का यह बड़ा हॉस्टल प्लान भी केवल 5 प्रतिशत छात्रों की आवासीय आवश्यकता को ही पूरा कर सकेगा। बाकी बचे 95 प्रतिशत से अधिक छात्रों को निजी पीजी, फ्लैट्स या अन्य महंगे माध्यमों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा।
सीटों का पूरा गणित: मौजूदा स्थिति बनाम नए प्रस्ताव
अगर हम आंकड़ों का गहन विश्लेषण करें, तो पता चलता है कि डीयू प्रशासन और इसके कॉलेज मिलकर भी छात्रों की इस बुनियादी जरूरत को पूरा करने में काफी पीछे रहे हैं। वर्तमान में हॉस्टल सीटों की स्थिति को इस प्रकार समझा जा सकता है:
- मौजूदा सीटें: वर्तमान में पूरे विश्वविद्यालय में कुल 7,210 हॉस्टल सीटें उपलब्ध हैं।
- यूनिवर्सिटी स्तर के हॉस्टल: इनमें से केवल 3,422 सीटें ही विश्वविद्यालय स्तर के हॉस्टलों में उपलब्ध हैं।
- कॉलेज स्तर के हॉस्टल: डीयू के अलग-अलग कॉलेजों के हॉस्टलों में कुल 3,788 सीटें उपलब्ध हैं।
इस भारी कमी को देखते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अपनी क्षमता बढ़ाने का फैसला किया है। इसके तहत यूनिवर्सिटी ने कुल 5,544 नई सीटें जोड़ने का एक नया प्रस्ताव तैयार किया है। इस नए विस्तार की रूपरेखा कुछ इस प्रकार है:
- प्रस्तावित नई सीटें (यूनिवर्सिटी स्तर): प्रशासन विश्वविद्यालय स्तर पर 3,922 नई सीटें तैयार करने की योजना बना रहा है।
- प्रस्तावित नई सीटें (कॉलेज स्तर): विभिन्न कॉलेजों के स्तर पर कुल 1,622 नई सीटें जोड़ी जाएंगी।
जब हम इन मौजूदा और नए प्रस्तावित आंकड़ों को जोड़ते हैं, तो आने वाले समय में कुल उपलब्ध सीटों की संख्या बढ़कर 12,754 हो जाएगी। लेकिन ढाई लाख से अधिक नियमित छात्रों के सामने यह संख्या बहुत छोटी साबित होती है।
पाइपलाइन में मौजूद बड़े प्रोजेक्ट्स और राहत की उम्मीद
हालांकि, स्थिति को सुधारने के लिए डीयू प्रशासन कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम कर रहा है, जो निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। इन प्रोजेक्ट्स के पूरा होने से आने वाले समय में छात्रों को कुछ हद तक राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है:
- ढाका कॉम्प्लेक्स: ढाका कॉम्प्लेक्स में लगभग बनकर तैयार हो चुका 'इंस्टीट्यूट ऑफ एमीनेंस' हॉस्टल छात्रों के लिए एक बड़ी राहत बनेगा। इसमें कुल 1,450 सीटें होंगी।
- निर्भया रेजिडेंशियल अकोमोडेशन: महिला छात्राओं की सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए 1,000 सीटों वाला 'निर्भया रेजिडेंशियल अकोमोडेशन' तैयार किया जा रहा है।
- स्टूडियो अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स: इसके अलावा, आधुनिक सुविधाओं से लैस 1,050 सीटों वाला एक स्टूडियो अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स भी विकसित किया जा रहा है।
इन परियोजनाओं के धरातल पर उतरने के बाद कैंपस में रहने वाले छात्रों की संख्या में कुछ सुधार जरूर देखने को मिलेगा, जिससे माता-पिता की चिंता थोड़ी कम होगी।
सत्य निकेतन हादसे के बाद प्रशासन की सख्ती और निर्देश
छात्रों की सुरक्षा का मुद्दा केवल रहने की जगह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर उनकी जान से जुड़ा हुआ है। हाल ही में दिल्ली के सत्य निकेतन में हुई दर्दनाक इमारत ढहने की घटना ने इस खतरे को उजागर कर दिया है। इस हादसे में 7 लोगों की असमय मृत्यु हो गई, जिनमें दिल्ली विश्वविद्यालय के 5 छात्र भी शामिल थे। इन छात्रों को कैंपस में हॉस्टल न मिलने के कारण बाहर निजी कमरों में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
इस हादसे के बाद डीयू प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने सभी कॉलेज प्रिंसिपल्स को कड़े निर्देश जारी किए हैं। उन्हें अपने-अपने कॉलेजों के कैंपस में मौजूद सभी आवासीय और हॉस्टल सुविधाओं की तुरंत सुरक्षा जांच करने को कहा गया है। इसके साथ ही, प्रिंसिपल्स को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने कॉलेजों में चल रहे हॉस्टल प्रोजेक्ट्स के काम में तेजी लाएं और नए हॉस्टल निर्माण की संभावनाओं को तलाशें ताकि सुरक्षा मानकों के साथ कोई समझौता न हो।
केंद्र सरकार को भेजे जाएंगे नए प्रस्ताव
दिल्ली यूनिवर्सिटी प्रशासन का मानना है कि छात्रों के इस गंभीर आवास संकट को केवल मौजूदा संसाधनों के बल पर हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए आने वाले दिनों में केंद्र सरकार और संबंधित विभागों को नए हॉस्टल प्रोजेक्ट्स और उनके बजट के लिए नए प्रस्ताव भेजे जाएंगे। जब तक डीयू में सरकारी हॉस्टलों की सीटें पर्याप्त संख्या में नहीं बढ़तीं और निजी पीजी के अनियंत्रित रूप से बढ़ते किरायों पर कोई कानूनी लगाम नहीं लगती, तब तक बाहरी राज्यों से आने वाले छात्रों के लिए दिल्ली में रहकर पढ़ाई करना एक बेहद खर्चीला और मानसिक तनाव से भरा संघर्ष बना रहेगा।
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