मऊ के अजय चौहान की अदम्य इच्छाशक्ति: दोनों हाथ खोने के बाद भी नाक और पैरों से चला रहे दुकान

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के रहने वाले अजय चौहान ने एक भीषण हादसे में अपने दोनों हाथ गंवा दिए थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आज वे अपनी नाक और पैरों की मदद से मोबाइल चलाने के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक दुकान चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।

जीवन की कठिन राह पर अजय का संघर्ष

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के चालीसवां गांव के रहने वाले अजय चौहान की जीवन गाथा किसी प्रेरणा से कम नहीं है। इंसान यदि ठान ले तो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना रास्ता निकाल सकता है, अजय ने इसे सच कर दिखाया है। एक भयावह दुर्घटना में अपने दोनों हाथ खो देने के बाद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आज वे अपनी मेहनत और अटूट हौसलों के दम पर न केवल अपना जीवन यापन कर रहे हैं, बल्कि अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी भी बखूबी संभाल रहे हैं।

साल 2007 में हुआ था दिल दहला देने वाला हादसा

अजय चौहान अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि साल 2007 में मुंबई में उनके साथ एक भीषण हादसा हुआ था। इस हादसे में उन्होंने अपने दोनों हाथ गंवा दिए। उस समय स्थिति इतनी कठिन थी कि उन्हें लगा कि उनका भविष्य पूरी तरह अंधकारमय हो चुका है। अजय बताते हैं कि मुंबई में अकेले रहकर उस हालत में जीवन गुजारना लगभग असंभव था, जिसके चलते उन्हें अपना काम छोड़कर वापस अपने गांव लौटना पड़ा। घर लौटने के बाद का समय उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन उन्होंने आत्म-सम्मान के साथ जीने का संकल्प लिया और कभी किसी के आगे मदद के लिए हाथ नहीं फैलाया।

इलेक्ट्रॉनिक दुकान से शुरू हुई आत्मनिर्भरता की कहानी

अजय के माता-पिता बुजुर्ग हैं और घर की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। हादसे के बाद उन्हें रेलवे विभाग से कुछ मुआवजा राशि मिली, जिससे उन्होंने अपने जीवन को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश की। उन्होंने एक छोटी सी गुमटी में इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकान शुरू की। इस काम में उन्हें अपने भाई का भरपूर सहयोग मिला। आज वे कई वर्षों से इसी दुकान के सहारे अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों का पेट पाल रहे हैं।

नाक और पैरों से करते हैं हर काम

आज अजय चौहान के लिए उनके पैर, नाक और मुंह ही उनके हाथ बन चुके हैं। उनकी कार्यक्षमता देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। यदि उन्हें मोबाइल इस्तेमाल करना हो, तो वे अपनी नाक और पैरों की मदद से उसे बेहद आसानी से चला लेते हैं। फोन कॉल रिसीव करने से लेकर टाइपिंग करने तक, वे सब कुछ तकनीक के सहारे कर लेते हैं। दुकान पर आने वाले ग्राहकों को सामान देना, बिल बनाना या कैलकुलेटर का उपयोग करना, वे पैरों की उंगलियों की मदद से बखूबी कर लेते हैं। जो सामान भारी होता है, वे ग्राहकों से ही उसे उठाने का आग्रह कर लेते हैं, वरना वे मुंह से सामान पकड़कर ग्राहकों को दे देते हैं।

शादी और परिवार का सहारा

अजय ने बताया कि साल 2007 के हादसे के बाद एक समय ऐसा आया था जब वे पूरी तरह टूट चुके थे। उन्हें लगा था कि अब उनका परिवार कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा। लेकिन साल 2021 में उनकी शादी हुई। शादी के बाद उनके जीवन में एक नया मोड़ आया और बच्चे हुए। आज यही बच्चे उनके लिए जीने का सबसे बड़ा सहारा और संबल बन गए हैं। परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की ललक ही उन्हें हर सुबह उठकर दुकान पर आने की प्रेरणा देती है।

दाल-चावल पर ही निर्भर है खान-पान

अजय के दैनिक जीवन में खाने-पीने को लेकर भी एक बड़ी चुनौती है। चूँकि वे अपने हाथों से रोटी नहीं तोड़ सकते, इसलिए उनका मुख्य आहार दाल और चावल तक ही सीमित रह गया है। यदि उनकी पत्नी उन्हें अपने हाथों से खिला दे, तो वे रोटी खा लेते हैं, अन्यथा उनका जीवन केवल दाल-चावल पर ही निर्भर है। उन्होंने एक कृत्रिम प्लास्टिक का हाथ भी लगवाया है, जिसकी मदद से वे चम्मच पकड़कर खाना खाने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया काफी कष्टदायक होती है।

अटूट जज्बे की मिसाल

अजय चौहान का कहना है कि आज के दौर में मोबाइल और तकनीक के बिना कोई भी व्यवसाय नहीं चल सकता, इसलिए उन्होंने बड़ी कुशलता से अपने शरीर के अंगों का इस्तेमाल करना सीख लिया है। वे गर्व के साथ कहते हैं कि वे किसी पर बोझ नहीं बनना चाहते और न ही किसी के आगे हाथ फैलाना पसंद करते हैं। आज भी जब वे उस हादसे को याद करते हैं, तो उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियां उन्हें रुकने नहीं देतीं। वे मऊ जिले के उन लोगों के लिए एक मिसाल बन चुके हैं जो छोटी-मोटी मुश्किलों से घबराकर हिम्मत हार जाते हैं।

https://hindi.news18.com/news/uttar-pradesh/mau-meet-ajay-chauhan-lost-both-hands-accident-refused-operates-mobile-phone-runs-electronics-shop-using-his-mouth-local18-ws-l-10815640.html