संघर्षों की राह से अंतरराष्ट्रीय मंच तक
झारखंड के देवघर की तंग गलियों में एक छोटी सी चाय की दुकान चलती है। इस दुकान पर एक नौजवान अपने पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता है। देखने में यह किसी भी आम युवक जैसी कहानी लग सकती है, लेकिन इस साधारण से दिखने वाले युवक के भीतर देश के लिए गौरव हासिल करने का एक असाधारण सपना पल रहा है। यह कहानी है देवघर के रहने वाले पैरा एथलीट रोहित कुमार की। दिन भर चाय की दुकान की भागदौड़ और आर्थिक तंगियों के बावजूद, रोहित ने अपने इरादों को कभी कमजोर नहीं होने दिया। जब दुकान का काम खत्म होता है, तो वह थकावट को दरकिनार कर खेल के मैदान में पसीना बहाते हैं। उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि उन्होंने सीमित संसाधनों के बीच खुद को अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है और देश के लिए रजत पदक भी जीता है।
शॉट पुट में रोहित की विशेष महारत
रोहित कुमार मुख्य रूप से पैरा एथलेटिक्स की शॉट पुट यानी गोला फेंक स्पर्धा के एथलीट हैं। उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय न केवल स्थानीय स्तर पर दिया है, बल्कि केंद्रीय जोन और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी अपने खेल का लोहा मनवाया है। गोला फेंक में उनका अब तक का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 9.64 मीटर दर्ज किया गया है। यह उपलब्धि उनके कठिन परिश्रम और खेल के प्रति अटूट समर्पण को दर्शाती है। हालांकि, इतने बड़े मंच पर पदक जीतने के बाद भी रोहित का सफर आसान नहीं रहा है, क्योंकि उनका संघर्ष खेल के मैदान से शुरू होकर घर की आर्थिक जिम्मेदारियों तक फैला हुआ है।
बिना कोच के खुद को तराशने की जिद्द
रोहित के खेल करियर की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उन्होंने लंबे समय तक बिना किसी प्रोफेशनल कोच और अत्याधुनिक खेल सुविधाओं के अपने कौशल को निखारा है। उनके पास बेहतर प्रशिक्षण के लिए आवश्यक संसाधन नहीं थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने इंटरनेट का सहारा लिया, दिग्गज खिलाड़ियों के वीडियो देखे और उनकी तकनीकों को समझकर खुद को प्रशिक्षित करना शुरू किया। लगातार अभ्यास और बारीकियों को सुधारने की उनकी यही जिद्द उन्हें देवघर के छोटे से मैदान से उठाकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं तक ले गई। बिना किसी मार्गदर्शन के अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का सफर तय करना उनकी मानसिक दृढ़ता का प्रमाण है।
आर्थिक तंगी बनी है राह की सबसे बड़ी बाधा
रोहित के परिवार की आर्थिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। पिता की चाय की दुकान ही उनकी आय का एकमात्र जरिया है। ऐसे में खेल के साथ घर की जिम्मेदारियों को निभाना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। एक एथलीट के रूप में उन्हें उच्च कोटि का आहार, महंगे खेल उपकरण और समय-समय पर विभिन्न शहरों में होने वाली प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए यात्रा का खर्च उठाना पड़ता है। संसाधनों की कमी ने उनके अभ्यास की रफ्तार को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। यदि समय रहते उन्हें आर्थिक सहयोग नहीं मिलता, तो उनकी इस प्रतिभा को बड़ा नुकसान हो सकता है।
झारखंड सरकार और खेल विभाग से उम्मीदें
इन तमाम बाधाओं के बाद अब रोहित ने झारखंड सरकार और राज्य के खेल विभाग से मदद की गुहार लगाई है। रोहित का मानना है कि यदि सरकार खेल कोटे के अंतर्गत उन्हें नौकरी देती है, तो उनका भविष्य सुरक्षित हो सकेगा और वह पूरे ध्यान के साथ अपने खेल पर केंद्रित कर पाएंगे। इसके अलावा, उन्हें बेहतर प्रशिक्षण सुविधाएं और स्पॉन्सरशिप की सख्त जरूरत है। किसी बड़ी कंपनी या संस्थान द्वारा सहायता मिलने पर वह अपनी खेल क्षमता को और अधिक निखार सकते हैं। रोहित का सपना सिर्फ एक पदक तक सीमित नहीं है। वह आने वाले समय में देश के लिए और भी बड़े पदक जीतना चाहते हैं और तिरंगे का मान पूरी दुनिया में बढ़ाना चाहते हैं। अब देखने वाली बात यह है कि क्या प्रशासन इस प्रतिभाशाली खिलाड़ी की आवाज सुनेगा और उन्हें सही समय पर उचित सम्मान और सहायता प्रदान करेगा।
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