जन्माष्टमी 2026: 15 साल बाद द्वापर युग जैसे संयोग में मनेगा श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, जानें निशीथ काल का शुभ समय

वर्ष 2026 की जन्माष्टमी पर ग्रहों और नक्षत्रों का बेहद दुर्लभ संयोग बन रहा है, जो ठीक वैसा ही है जैसा द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय था। भक्त इस वर्ष 4 सितंबर की मध्यरात्रि में विशेष पूजा और अभिषेक कर सकते हैं।

जन्माष्टमी 2026 पर दुर्लभ खगोलीय योग

हिंदू धर्म में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी का पर्व अत्यंत हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था। इस वर्ष 4 सितंबर 2026 को देशभर में जन्माष्टमी की धूम देखी जा रही है। करौली सहित पूरे प्रदेश के मंदिरों में विशेष सजावट और तैयारियां की गई हैं, जिससे श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह नजर आ रहा है।

15 वर्षों बाद द्वापर युग जैसा संयोग

करौली के प्रसिद्ध कर्मकांड विशेषज्ञ पंडित मनीष उपाध्याय के अनुसार, इस साल की जन्माष्टमी पर एक अत्यंत दुर्लभ और अद्भुत खगोलीय संयोग निर्मित हो रहा है। यह संयोग पूरे 15 वर्षों के अंतराल के बाद देखने को मिल रहा है। ज्योतिषी का मानना है कि इस बार ग्रहों की स्थिति और नक्षत्रों का मेल बिल्कुल वैसा ही है, जैसा द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय मौजूद था। इस दिन भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में चंद्रमा का महासंयोग बन रहा है। साथ ही, इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, हर्षण योग, बुधादित्य योग, मालव्य योग और हंस योग का एक साथ बनना इसे और भी अधिक कल्याणकारी बनाता है। इन योगों का एक साथ होना धार्मिक दृष्टि से इस दिन के महत्व को कई गुना बढ़ा देता है।

निशीथ काल पूजा का शुभ मुहूर्त

चूंकि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अर्धरात्रि यानी मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए जन्माष्टमी के दिन निशीथ काल पूजा का विशेष विधान और महत्व माना गया है। पंडित मनीष उपाध्याय ने जानकारी दी है कि 4 सितंबर की रात निशीथ काल का कुल शुभ समय 11:57 बजे से शुरू होकर मध्यरात्रि 12:43 बजे तक रहेगा। इस प्रकार, श्रद्धालुओं को प्रभु के जन्मोत्सव की मुख्य पूजा, विधि-विधान और अभिषेक के लिए कुल 45 मिनट का ही विशेष और अति-शुभ समय प्राप्त होगा। इस सीमित समयावधि में की गई पूजा को बहुत फलदायी माना जाता है।

निशीथ काल में पूजन की विधि

ज्योतिषी ने निशीथ काल में पूजन की विशेष विधि के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि भक्तों को इस पवित्र समय का पूरा लाभ उठाना चाहिए। पूजन विधि निम्नलिखित है:

  • सबसे पहले अपने घर में विराजमान बाल गोपाल या लड्डू गोपाल की प्रतिमा को पंचामृत से अभिषेक कराएं। इस पंचामृत में दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का मिश्रण शामिल होना चाहिए।
  • अभिषेक के पश्चात प्रतिमा को शुद्ध जल से स्नान कराएं।
  • स्नान के बाद भगवान को चंदन का तिलक लगाएं और उन्हें उनके अत्यंत प्रिय पीले वस्त्र यानी पीतांबर धारण कराएं।
  • इसके बाद भगवान को सुगंधित पुष्प और इत्र अर्पित करें।
  • पूजन में उन्हें माखन और मिश्री का विशेष सात्त्विक भोग लगाएं।
  • अंत में धूप और दीप जलाकर पूर्ण भक्ति के साथ भगवान की आरती करें।

ऐसी मान्यता है कि यदि भक्त इस विधि का पालन करते हुए निशीथ काल में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं, तो उनके परिवार में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। भक्त इस दिन मंदिरों में दर्शन और अपने घरों में विशेष पूजा कर इस दुर्लभ संयोग का लाभ उठा सकते हैं।

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