बागेश्वर के गोलना में चूल्हे वाले मच्छी-भात का जादू, पिंडारी ट्रैक के सफर में पर्यटकों की पहली पसंद बना पहाड़ी स्वाद

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में पिंडारी ग्लेशियर के दुर्गम रास्ते पर स्थित गोलना गांव अपने पारंपरिक चूल्हे के मच्छी-भात से यात्रियों का दिल जीत रहा है। यह स्थानीय व्यंजन न केवल थकान मिटाता है, बल्कि ग्रामीण पर्यटन को भी नई पहचान दे रहा है।

पहाड़ों की वादियों में खास पहाड़ी स्वाद

उत्तराखंड का बागेश्वर जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता, गगनचुंबी बर्फीले पहाड़ों, कलकल करती नदियों और रहस्यमयी ग्लेशियरों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। हालांकि, यहां की यात्रा केवल प्राकृतिक नजारों तक ही सीमित नहीं है। देवभूमि की आबोहवा में रचे-बसे पारंपरिक व्यंजन मुसाफिरों की रूह को तृप्त करने का काम करते हैं। पिंडारी ग्लेशियर के कठिन और दुर्गम रास्तों पर जब पर्यटक अपनी थकान मिटाने के लिए गोलना गांव पहुंचते हैं, तो वहां चूल्हे पर पके ठेठ पहाड़ी 'मच्छी-भात' की सोंधी खुशबू उनका स्वागत करती है। यह सफर केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की ग्रामीण संस्कृति का एक जीवंत उत्सव बन जाता है।

सड़क किनारे बसे ढाबों का आकर्षण

जैसे ही यात्री गोलना क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, सड़क किनारे बने छोटे-छोटे ढाबों और भोजनालयों से आती खुशबू बरबस ही उनका ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। यहाँ पहाड़ी अंदाज में तैयार की गई ताजी मछली और गर्मागर्म चावल की थाली को सादगी भरे भोजन की पहचान माना जाता है। पिंडारी ग्लेशियर की कठिन चढ़ाई और लंबी दूरी तय करने के बाद, पर्यटक थकान मिटाने के लिए इन ढाबों में रुकना और पारंपरिक स्वाद का आनंद लेना बेहद पसंद करते हैं।

चूल्हे की आंच और पारंपरिक तड़का

स्थानीय व्यापारी महेश सिंह शाही के अनुसार, इस मच्छी-भात की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी और स्थानीयता है। आधुनिक गैस चूल्हों के दौर में भी यहाँ के लोग पारंपरिक चूल्हे पर खाना पकाते हैं, जिससे मसालों और बनाने के तरीके का स्वाद बिल्कुल अलग और यादगार हो जाता है। गर्म भात के साथ परोसी जाने वाली मछली यात्रियों को पहाड़ के पारंपरिक खानपान की जड़ों से जोड़ती है। कई पर्यटकों के लिए यह मात्र एक भोजन नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन और स्थानीय संस्कृति को करीब से अनुभव करने का एक माध्यम बन गया है।

मुश्किल सफर में राहत का जरिया

गोलना की पहचान पिंडारी क्षेत्र की यात्रा के प्रमुख पड़ाव के रूप में है। पिंडारी मार्ग पर अक्सर मौसम के दौरान भारी बारिश और भूस्खलन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार सड़क पर मलबा और पत्थर आने से यातायात बाधित हो जाता है, जिससे यात्रियों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसी कठिन परिस्थितियों में रास्ते में पड़ने वाले ये छोटे ढाबे यात्रियों के लिए भोजन और विश्राम का एक सुरक्षित और सुविधाजनक ठिकाना साबित होते हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रहा संबल

स्थानीय खानपान को पर्यटन से जोड़ने के प्रयास गोलना जैसे गांवों के लिए संजीवनी का काम कर रहे हैं। जब पर्यटक यहाँ रुककर स्थानीय व्यंजनों का आनंद लेते हैं, तो उसका सीधा आर्थिक लाभ गांव के छोटे दुकानदारों, ढाबा मालिकों और स्थानीय कामगारों को मिलता है। यह न केवल हमारी पारंपरिक पाक कला को जीवित रखने में मदद करता है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा करने का भी एक सशक्त माध्यम बनता है।

यादों में बसता अनुभव

गोलना में मच्छी-भात का स्वाद लेने वाले पर्यटकों के लिए यहाँ का वातावरण और भी खास अनुभव जोड़ देता है। पहाड़ी आबोहवा, सड़क के किनारे बसे गांव और स्थानीय निवासियों का सहज व्यवहार इस भोजन के स्वाद को दोगुना कर देता है। चूल्हे से निकलकर सीधी थाली तक पहुंचने वाला यह पहाड़ी स्वाद गोलना की स्थानीय पहचान, लोक संस्कृति और ग्रामीण पर्यटन की एक अनोखी कहानी बयां करता है। पिंडारी ग्लेशियर की ओर रुख करने वाले लगभग हर यात्री की डायरी में गोलना के इस स्वाद का जिक्र और यहाँ बिताए गए कुछ पल हमेशा के लिए यादगार बन जाते हैं।

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