जहानाबाद की ऐतिहासिक धरोहर
बिहार की राजधानी पटना और गया की पावन भूमि के बीच स्थित जहानाबाद जिला अपने अंदर कई प्राचीन रहस्यों को संजोए हुए है। वाणावर की पहाड़ियों में स्थित गुफाएं हों या हुलासगंज के दावथू और रतनी के घेजन गांव में मिली भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं, ये सभी इस क्षेत्र की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत का प्रमाण हैं। इसी ऐतिहासिक कड़ी में एक और महत्वपूर्ण नाम जुड़ता है सुपी गांव का, जो जिला मुख्यालय से मात्र 14 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ का प्राचीन गढ़ न केवल मुगलकालीन बल्कि उससे भी कहीं अधिक पुराना इतिहास अपने भीतर समेटे हुए है।
गढ़ की अभेद्य बनावट
सुपी गांव में स्थित यह विशाल गढ़ आज भले ही जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, लेकिन इसके अवशेष आज भी इसकी भव्यता की कहानी बयां करते हैं। जानकारों और स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह संरचना किसी समय अभेद्य सुरक्षा घेरे में रही होगी। इस गढ़ की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह चारों तरफ से पानी से घिरा हुआ था। नहर के आकार के जलाशय के बीच में स्थित इस गढ़ का निर्माण मुख्य रूप से बाहरी आक्रमणकारियों से सुरक्षा के उद्देश्य से किया गया था।
इसकी निर्माण शैली काफी अनूठी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे बनाने में मिट्टी, गारा और चूने का व्यापक उपयोग किया गया था। आज भी इसके अवशेषों में मिट्टी और गारे की मजबूत परतें देखी जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त, खुदाई के दौरान मिलने वाले मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह स्थान मुगल काल से भी पुराना है। माना जाता है कि इस गढ़ के चारों कोनों पर ऊंचे टावर हुआ करते थे, जहां से सैनिक हर समय पूरी निगरानी रखते थे।
मुगल और अंग्रेजों का डेरा
ऐतिहासिक दस्तावेजों और जनश्रुतियों के अनुसार, इस गढ़ का उपयोग अलग-अलग कालखंडों में विभिन्न शासकों द्वारा किया गया। मुगल सैनिकों ने अपने शासनकाल के दौरान इसे एक सुरक्षित ठिकाने के रूप में इस्तेमाल किया था, ताकि क्षेत्र में होने वाले विद्रोहों को समय रहते नियंत्रित किया जा सके। समय के साथ यह सुरक्षा संरचना अंग्रेजों के हाथ में भी आई। अंग्रेजी सैनिकों ने भी अपनी सैन्य रणनीति और सुरक्षा व्यवस्था के दृष्टिकोण से इस गढ़ का बखूबी उपयोग किया। इसकी भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा व्यवस्था ही ऐसी थी कि हर शासक ने इसे अपने नियंत्रण में रखना जरूरी समझा।
संरक्षण की गुहार
समय की मार ने सुपी के इस विशाल गढ़ के अस्तित्व को धीरे-धीरे मिटाना शुरू कर दिया है। आज स्थिति यह है कि नई पीढ़ी के कई युवा इसके महत्व से पूरी तरह अनजान हैं। ग्रामीणों के लिए यह गहरी चिंता का विषय है कि उनकी आंखों के सामने यह अमूल्य धरोहर लुप्त हो रही है। स्थानीय निवासी ललित शंकर का कहना है कि उन्होंने बचपन से ही इस गढ़ को देखा है, लेकिन अब यह केवल खंडहर बनकर रह गया है।
लोगों की पुरजोर मांग है कि प्रशासन इस स्थल पर वैज्ञानिक तरीके से खुदाई करवाए। यदि पुरातत्व विभाग यहां खुदाई करे, तो कई ऐतिहासिक साक्ष्य बाहर आ सकते हैं जो मगध की खोई हुई पहचान को वापस ला सकते हैं। इसके अलावा, आमस-दरभंगा एक्सप्रेसवे का इस गढ़ के बगल से गुजरना इसे पर्यटन की दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण बनाता है। यदि इस ऐतिहासिक स्थल का संरक्षण किया जाए, तो यह क्षेत्र न केवल पर्यटन का केंद्र बनेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली इतिहास से जुड़ने का अवसर भी मिलेगा। ग्रामीण अब सरकार से अपील कर रहे हैं कि इस ऐतिहासिक धरोहर को संवारने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं ताकि सुपी का यह गढ़ फिर से अपनी पुरानी पहचान पा सके।
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